गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

Guru Purnima : भारतवर्ष में गुरू को देवतुल्य माना गया है। कहते है बिना गुरू के ज्ञान संभव नहीं हैं। चाहे फिर वह किसी भी क्षेत्र में हो। कहीं न कहीं हमें मार्गदर्शन के लिए गुरू की आवश्यकता जरूर पड़ती है। चाहे फिर वह शिक्षा के क्षेत्र में हो या फिर आपके पैरेंटस के रूप में हो। जीवन में गुरू का स्थान काफी महत्वपूर्ण है। 
गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

बिना ज्ञान के हम सभी अधूरे हैं और ज्ञान के लिए हमें जीवन में एक गुरू की जरूर आवश्यकता होती है। आज हम यहां गुरू की महत्व के बारे में बताने वाले हैं। साथ ही जानेंगे कि इस वर्ष गुरू पूर्णिमा कब है और यह गुरू पूर्णिमा आखिर क्यो मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा पर्व के पीछे की क्या कहानी है।

हमारे देश में पर्व को लेकर कुछ न कुछ पौराणिक मान्यताएं जरूर रहती हैं। ऐसे में गुरू पूर्णिमा को लेकर भी कुछ पौराणिक मान्यताएं हैं। जानकारों की माने तो गुरू पूर्णिमा पर्व महर्षि वेदव्यास से जुड़ा हुआ है। भारत में वैसे तो गुरू एवं शिष्य के बीच कई कथाएं आपने सुनी होगी। ये कथाएं हमें सही मायने में यह बताती है कि जीवन में गुरू का क्या महत्व हैं। 
गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

गुरू अपने शिष्य के अंधकारमय जीवन में ज्ञान की रोशनी भरकर उसे सही दिशा दिखाता है। भारतवर्ष में गुरू एवं शिष्य का रिश्ता बहुत ही खास होता हैं। शिष्य अपने गुरू को पुज्यनीय देव स्वरूप मानते हैं। तो चलिए जानते है क्यों मानाया जाता है गुरू पूर्णिमा। इस दिन शिष्य अपने गुरूओं किस तरह याद करते हैं। और यह परम्परा कब से शुरू हुई।

क्या है गुरू पूर्णिमा - What is Guru Purnima in hindi

गुरू पूर्णिमा पर्वः भारत देश में मनाया जाने वाला पर्व हैं। इस दिन शिष्य अपने गुरू की वंदना करते हैं। उनका सम्मान करते है। उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। स्कूलों में गुरू पूर्णिमा के दिन काफी उत्साह देखा जाता है। छात्र अपने गुरूओं का सम्मान करके जीवनभर ज्ञानरूपी आर्शिवाद प्राप्त करते हैं। बहुत सारे लोग इस दिन अपने वैदिक गुरूओं की पूजा करते हैं। तो कुछ लोग साधू-संत की पूजा-अर्चना करते हैं।

 पूजा-अर्चना उपरांत शिष्य अपने गुरूओं को उपहार भी भेंट करते हैं। साथ ही गुरूओं से ज्ञानरूपी आर्शिवाद भी प्राप्त करते हैं। चूंकि गुरू पूर्णिमा पर्व महर्षि वेदव्यास जी से जुड़ी हैं। इसलिए कुछ लोग उनकी छायाचित्र की पूजा-अर्चना करते है। मान्यता है कि गुरू पूर्णिमा के दिन गुरू का आर्शिवाद लेने से जीवन सफल हो जाता है।
गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

कब मनाया जाता है गुरू पूर्णिमा?

गुरू पूर्णिमा पर्व हर वर्ष भारत देश में मनाया जाता है। यह पर्व महर्षि वेदव्यास जी को समर्पित है। हिन्दू पंचांगों की माने तो गुरू पूर्णिमा का पर्व हर वर्ष अषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। गुरू पूर्णिमा साल 2020 में 5 जुलाई को मनाई जानी है। मान्यता है कि इसी दिन तकरीबन 3000 ई. वर्ष पूर्व महर्षि वेदव्यास जी का धरती लोक में अवतरण हुआ था। तब अषाढ़ मास में पड़ने वाली पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। 

गुरू पूर्णिमा 2020 में कब है और 2021 में कब होगी?

जानकारों की माने तो गुरू पूर्णिमा पर्व साल 2019 में 16 जुलाई को मनाई गई थी। तो वहीं इस वर्ष गुरू पूर्णिमा 5 जुलाई को मनाई जानी है। गुरू पूर्णिमा का महुर्त 4 जुलाई को सुबह 11ः33 से प्रारंभ होकर 5 जुलाई को प्रातः 10ः13 बजे समाप्त हो जाएगा। इसी तरह साल 2021 में गुरू पूर्णिमा पर्व 24 जुलाई को मनाया जाएगा।

क्यो मानाया जाता है गुरू पूर्णिमा?

भारत में गुरूओं को प्राचीन काल से देवस्वरूप माना गया है। गुरू अपने शिष्यों को आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते थे। शिष्य पूर्णिमा के दिन अपने गुरूओं की पूजा-अर्चना करते थे। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन गुरू का आर्शिवाद शुभ फल प्रदान कर जीवन में सुखमय बनाता है।

गुरू पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। यह पर्व उन्हीं को समर्पित है। महर्षि वेदव्यास जी का धरती लोक में अवतरण अषाढ़ मास की गुरू पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसी दिन से इस पूर्णिमा को देशभर में गुरू पूर्णिमा के रूप में जाना जाने लगा और शिष्य इस दिन अपने गुरूओं का मान, सम्मान एवं पूजन आदि करके शुभ फल प्राप्त करते हैं। 

गुरू पूर्णिमा पर्व को लेकर एक और मान्यता है काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि गुरू पूर्णिमा के बाद से 4 महीने तक का मौसम शिक्षा के हिसाब से काफी अनुकूल होता है। इन चार माहों में न अधिक गर्मी होती और न ही सर्दी।
गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

गुरू पूर्णिमा की कहानी

गुरू पूर्णिमा पर्व भारत वर्ष में हर वर्ष अषाढ़ मास की पूर्णिमा को मानाया जाता है। इसी दिन लगभग 3000 ई. वर्ष पूर्व महार्षि वेदव्यास जी का धरती लोक में अवतरण हुआ था। महर्षि वेदव्यास जी वेद, उपनिषद एवं पुराणों का प्रणयन करने वाले मनुष्य जाति का प्रथम गुरू माना गया है। मान्यता है कि इस दिन महर्षि वेदव्यास जी अपने शिष्यों एवं ऋषि मुनियों को सर्वप्रथम भगवत गीता का ज्ञान दिया था। गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। शास्त्रों की माने तो महर्षि वेदव्यास जी तीनों काल के ज्ञाता थे। हिन्दू धर्म के चारों वेदों का विभाग किया। महर्षि वेदव्यास द्वारा ही श्रीमद भागवत महापुराण की रचना के साथ ही अठारह पुराणों की रचना की गई। 

गुरू पूर्णिमा का महत्व

गुरू का स्थान भारत वर्ष में प्राचीनकाल से ही सर्वश्रेष्ठ रहा है। इस दिन शिष्य अपने गुरूओं की वंदना करते हैं। कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। उनका आदर करते हैं। सम्मान करते हैं। गुरू एवं शिष्य की बहुत सी कथा प्रचलित है। इन कथाओं का श्रवण करके शिष्य के जीवन में गुरू की क्या महत्वतता है उसे सहज ही समझा जा सकता है। गुरू को हिन्दू धर्म में ब्रम्हा, विष्णू, महेश के रूप में पूजा गया है। 

इसलिए गुरू पूर्णिमा का पर्व अंधविश्वास से नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए। गुरू अपने शिष्य के अंधकारमय जीवन में ज्ञान भरकर प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरू पूर्णिमा साल भर में पड़ने वाली सभी पूर्णिमा में सबसे खास होती है। मान्यता है कि गुरू पूर्णिमा का पुण्य अर्जित करने से साल भर पड़ने वाली सभी पूर्णिमाओं के बराबर पुण्य लाभ मिलता है।

गुरू पूर्णिमा का पर्व कैसे मनाया जाता है

स्कूल एवं कालेजों में छात्र-छात्राएं गुरू पूर्णिमा के दिन अपने-अपने शिक्षक एवं शिक्षकाओं का सम्मान करते हैं। उन्हें गुरू पूर्णिमा के दिन कुछ उपहार स्वरूप भेंट करते हैं। साथ ह उनका आर्शिवाद भी प्राप्त करते हैं। गुरू पूर्णिमा कुछ छात्र-छात्राएं गुरूजी के सम्मान में सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन करते हैं। जिसमें डांस, भाषाण आदि प्रकार से गुरू का सम्मान करते हैं। 
गुरू पूर्णिमा क्यो मनाया जाता है, जानिए महत्व

प्राचीनकाल में शिष्य गुरू के आश्रम में शिक्षा ग्रहण किया करते थे। जहां वह पूर्णिमा के दिन सुबह-सुबह स्नान आदि करके अपने-अपने गुरूओं का विधि-विधान पूर्वक पूजा एवं चरण वंदना किया करते थे। जिन भी लोगों के गुरू दिवंगत हो गए हैं वह उनकी चरण पादुका की पूजा-पाठ करके आर्शिवाद प्राप्त करते हैं। कुछ लोग गुरू पूर्णिमा को मुर्हूत में मनाते हैं। 

शिष्य सुबह-सुबह जल्टी उठकर स्नान आदि करके नए वस्त्र धारण करते हैं। फिर अपने गुरू की छाया चित्र के सामने आशन रखकर बैठ जाते हैं। फिर गुरू की पूजा विधि-विधान पूर्वक करके उनसे ज्ञानरूपी प्रकाश जीवन में बनाए रखने का आर्शिवाद लेते हैं। 

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