पानी के तलाश में बस्ती तक पहुंची बाहरसिंघा, दुर्घटना में घायल

रीवा। लॉक डाउन के बीच पेयजल संकट न केवल मानव जाति के लिए गहरा रहा है बल्कि जंगलों में स्थित प्राकृतिक जल स्त्रोत भी सूख रहे हैं। जिसके कारण अब जंगलीय जीव पानी के तलाश में बस्तियों का रूख कर रहे हैं। जंगल में सूख रहे प्राकृतिक जल स्त्रोत को वन विभाग गंभीरता से ले रहा है। जहां एक बारहसिंघा पानी की तलााश्ा में बस्ती तक पहुंचने के लिए सड़क पार करते समय अज्ञात वाहन की ठोकर से घायल हो गया। वन विभाग की टीम सूचना पाकर मौके पर पहुंचने के साथ ही बाहरसिंघा को इलाज के लिए वन विभाग के मुख्यालय लेकर पहुंची है। 
पानी के  तलाश में बस्ती तक पहुंची बाहरसिंघा, दुर्घटना में घायल

जिसका इलाज करने के बाद बाहरसिंघा को डॉक्टरों की देखरेख में रखा गया है। वहीं दूसरी ओर रीवा डीएफओ चंन्द्रशेखर सिंह ने जिले के समस्त वन रक्षक सहित वन चौकीदारों को निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं। हालांकि विभाग दबी जुबान यह स्वीकार करने को तैयार है कि जंगलों से बीच होकर बहने वाली नदियां, झरने व तालाबों में पानी सूख चुका हैं। लिहाजा पानी की तलाश में जंगलीय जीव इधर-उधर भटकते सहज ही देखे जा सकते हैं। 

मई-जून में बनती है स्थिति

वन विभाग के जानकारों की माने तो जंगल से जंगलीय जीवों का पलायन अमूनन मई और जून में देखने को मिलता है। कारण यह है कि इन दिनों जंगल में स्थित प्राकृतिक जल स्त्रोत के जल स्तर में न केवल गिरावट दर्ज की जाती है बल्कि जंगल में हरियाली भी कम हो जाती है। पानी की तलाश में जंगलीय जीव रात में तकरीबन 15-20 किलोमीटर का सफर तय कर मानव निर्मित बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। 

शिकारी उठाते हैं लाभ

वन विभाग के जानकारों की माने तो गर्मी के दिनों में चिंहित जल स्त्रोत में ही पानी उपलब्ध होता है। लिहाजा शिकारी जल स्त्रोत के इर्द-गिर्द ही एम्बुश लगाकर जंगलीय जीवों का शिकार करते हैं। इसके लिए उनके द्वारा शिकार के लिए प्रयुक्त होने वाला प्राचीन तरीके से फंदे लगाने या फिर करंट लगाकर शिकार करने की योजना को असली जामा पहनाया जाता है। इस दौरान शिकारी फंदे लगाकर प्राकृतिक जल स्त्रोतों के पास छिपकर बैठ जाते हैं। उन्हें पता होता है कि जंगलीय जीव अपनी प्यास बुझाने के लिए संबंधित जल स्त्रोत आएंगे। जंगलीय जीव जैसे से ही जल स्त्रोत के पास पहुंचते हैं तो शिकारी उन्हें अपना शिकार बना लेते हैं। 

इनका होता है बहुतायत में शिकार

विंध्य पर्वत माला पर बसा रीवा जिला प्राकृतिक रूप से काफी समृद्धशाली है। बहुतायत में खनिज एवं जंगल यहां पाए जाते हैं। जिले के तराई के अंचल में स्थित जंगल में शिकार सार्वधिक शिकार गर्मी के दिनों में प्राकृतिक जल स्त्रोत के सूखने के बाद करते हैं। जिन जानवरों का शिकार बहुतायत में किया जाता है उनमें जंगलीय सुअर, बाहरसिंघा, साभंर, खरगोश एवं जंगलीय पक्षी शामिल होते हैं। कई बार वन विभाग ने इस तरह के शिकार को रोकने के लिए वन कर्मियों को सचेत रहने की चेतावनी भी जारी कर चुका है। 

इन बीटों पर विशेष नजर

मई महीना के शुरूआती दिनों में ही सार्वधिक जंगलीय जीवों के सामने पानी का संकट आधा दर्जन से अधिक क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। जिसमें सिरमौर, पटेहरा, पनवार, अतरैला, डभौरा, हर्दी, घुसरूम का क्षेत्र शामिल है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां जहां बरसात के दिनों में पहाड़ी नदियों व झरनों का बोलबाला रहता है। लेकिन गर्मी का दिन आने के साथ ही यहां जंगलीय जीवों के सामने पेयजल संकट उत्पन्न् हो जाता है।

जंगल में आदमी का दखल

जंगलीय जीव इन दिनों पेजयल समस्या के साथ ही जंगल में आदमी के दखल के कारण मानव बस्तियों का रूख कर रहे हैं। कारण यह कि इन दिनों जंगल में महुएं के फल को बिनने तथा तेंदूपत्ता की तुड़ाई के लिए बहुतायत की संख्या में श्रमिक जंगलों में जा रहे हैं। जिससे जंगलीय जीवों का ध्यान भंग हो रहा है। 


वर्जन

जंगल से एक बाहरसिंघा बस्ती की ओर आ गया था। जहां सड़क पार करते समय अज्ञात वाहन की ठोकर से वह घायल हो गया। जिसका इलाज किया जा रहा है। साथ ही वन रक्षक व वन चौकीदारों को सुरक्षा की दृष्टिकोण से अलर्ट रहने के निर्देश जारी किए जा चुके हैं। जंगलीय जीवों का शिकार न हो इसके लिए भी हम विशेष ध्यान दे रहे हैं।
चन्द्रशेखर सिंह, डीएफओ, रीवा। 

Post a Comment

0 Comments