Navratri Second day Brahmacharini : जानिए पूजा की विधि व कैसे करें प्रसन्न

Navratri Second day Brahmacharini : नवरात्रि के दिनों में भक्त नौ देवियों की पूजा करते हैं। इन नौ दिनों में नौ देवियों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से देवी प्रसन्न होती है और अपने भक्त की हर मनोकामनाएं पूरी करती हैं। 
Navratri Second day Brahmacharini : जानिए पूजा की विधि व कैसे करें प्रसन्न

मान्यता है कि इन दिनों देवी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से घर में सुख-शांति, धन-धान्य, मान-सम्मान एवं बिगड़े हुए काम बनते हैं और पूरा साल खुशी-खुशी बीतता है। नवरात्रि का पर्व साल में दो बार आता है। चैत्र नवरात्रि एवं शारदेय नवरात्रि। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रम्हचारिणी की पूजा की जाती हैं। इस देवी को कई नामों से जाना जाता हैं। जैसे अर्पणा, उमा एवं तपश्चारिणी। यह देवी शांत मन से तप में लीन हैं। देवी ब्रम्हचारिणी ब्रम्हा का साक्षात रूप हैं। इनके दाए हाथ में अक्ष माला एवं बाएं हाथ में कमण्डल होता हैं।  

देवी ब्रम्हणचारिणी मां पार्वती के जीवनकाल का वह समय था जब वह जंगल में भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस दौरान उन्होंने पहले फल, फिर बेल पत्र इसके बाद निराहार होकर कई वर्षो तक कठोर तपस्या कर भोलेनाथ को प्रसन्न किया था। मां दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों को अमोघ फल एवं सिद्धी देने वाला होता हैं। 

मां ब्रम्हणचारिणी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने पर संयम, वैराग्य, तप, त्याग, सदाचार में वृद्धि होती है। इनके आर्शिवाद से भक्त को हर काम में सफलता मिलती है। जीवन में आ रही कई तरह की परेशानियों से छुटकारा मिलता है। नवदुर्गा के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए तथा ब्राम्हणों को चीनी का दान करना चाहिए। इसके पीछे मान्यता है कि ऐसा करने से भक्त की आयु में वृद्धि होती है। मां ब्रम्हचारिण की जप, उपासना करने से त्याग, सदाचार में वृद्धि होती है। 

क्या है विधि

मां ब्रम्हणचारिणी को प्रसन्न करने के लिए सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। इसके बाद मां की फूल, धूप, रोली, अक्षत दीप आदि से मंत्रोच्चारण के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। उन्हें दूध, दही, शर्करा, मधु आदि से स्नान कराएं। तत्पश्चात प्रसाद अर्पण करें। इसके बाद पानी से आचमन फेरे। इसके बाद पान, सुपारी अर्पण करके प्रदिक्षणा करें। कलश देवता की पूजा के बाद नगर देवता, ग्राम देवता आदि की विधि-विधान से पूजन करें। इन सबकी पूजा-अर्चना करने के बाद मां ब्रम्हचारिणी की हाथों में फूल व अक्षत लेकर विधि-विधान से पूजा करें। पूजा के दौरान इन मंत्रों को बोले।
“दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”..

तत्पश्चात मां को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद फूल, अक्षमत, कुमकुम, सिंदूर चढ़ावे। इसके बाद मां को लाल रंग का फूल अर्पित करें। अगर गुलाब का फूल मिले तो माला बनाकर पहनावे। क्योंकि मां को लाल रंग काफी पसंद है। फिर प्रसाद, आचमन करें और पान, सुपारी भेंट करके प्रदीक्षणा करे। इसके बाद घी का दीपक जलावे और मां की आरती करें। नीचे दिए जा रहे मंत्रों से मां का ध्यान, कवच पाठ एवं स्त्रोत पाठ करें। 

 ध्यान
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥

परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

 स्तोत्र पाठ 
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

 कवच 
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।


अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी” ।

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