Breaking News

फिलहाल नहीं है भाजपा में फील गुड, अंर्तकलह के शिकार हो रहे पदाधिकारी

At present, there is no good feeling in BJP, officials are suffering from internal interference : रीवा। जिले की आठों विधानसभा में काबिज भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर गुटबाजी का शिकार हो रही है। आठों विधायकों में से चार विधायकों का कुनबा एक तरफ है तो चार एक तरफ। परिणाम यह हो रहा है कि एक-दूसरे विधायक के खिलाफ ही असंतोषजनक माहौल बनवाने में समर्थक कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका है। जिसकी वजह से विधायकों की बदनामी तो हो ही रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर उस तरह का प्रशासनिक दवाब नहीं बन पा रहा है जिस प्रकार विपक्ष की भूमिका में एकजुट आठों विधायकों की होनी चाहिए। 

पिछले कुछ दिनों से ऐसी स्थितियां बनी है कि भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ता उस तन्मयता से सक्रिय होकर काम नहीं कर रहे हैं जैसे पहले संगठन के लिए किया करते थे। उसके पीछे का कारण यह भी है कि स्थानीय स्तर पर गुटबाजी का दौर चल रहा है। सामान्य तौर पर यह माना जा रहा है कि रीवा में संगठन किसी एक नेता के इशारे पर ही संचालित हो रहा है। 

जिसकी वजह से संगठन के जिलाध्यक्ष और पार्टी संगठन के पदाधिकारी केवल उतना ही करते हैं जितना नेताजी का निर्देश प्राप्त होता है। यही हालत नगर निगम में बनी हुई है। यहां भी भाजपा के नेताओं की नाराजगी इस बात को लेकर है कि महापौर भी केवल एक और एक ही नेता जी की सुनती हैं। जिसकी वजह से पार्टी की कई बार किरकिरी भी हो चुकी है। 

पिछले 20 दिनों पूर्व भारतीय जनता पार्टी जिला इकाई के महामंत्री सत्यमणि पाण्डेय का ऑडियो वायरल होने के बाद इस मामले की पुष्टि भी हो गई थी कि किस तरह से एक तरफा स्तर पर ही पार्टी संगठन सुनता है। हालांकि इस मामले में दवाब इतना ज्यादा पड़ गया कि सत्यमणि को पार्टी से निलंबित करने का निर्णय लेना पड़ा। हालांकि सत्यमणि पाण्डेय उसी तरह पार्टी की बैठकों में शामिल हो रहे हैं। निश्चित तौर पर इससे मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल आहत हो रहे हैं। 

सूत्र बताते हैं कि ऑडियो वायरल कैसे हो गया, यह मुद्दा अभी भी जांच का विषय है। कहा जाता है कि यह ऑडियो सत्यमणि पाण्डेय के पास से ही उनके सबसे नजदीकी व्यक्ति ने वायरल किया था। जिससे पार्टी की खासी किरकिरी हुई। दूसरी ओर अभी हाल-फिलहाल त्योंथर विधायक और स्थानीय नायब तहसीलदार के बीच हुई गाली-गलौज का ऑडियो वायरल करने के मामले में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के अत्यंत करीबी का हाथ बताया गया है। इन दोनों मामलों में अब यह खोजबीन तेजी से चल रही है कि आखिर यह कारनामा किसका था। 

इस बीच प्रदेश संगठन पदाधिकारियों की कार्यशैली से स्थानीय स्तर के चार विधायक खासा नाराज हैं। उनका कहना यह है कि प्रदेश संगठन रीवा संभाग के मामले में रीवा के केवल एक नेता ही सुनता है अन्य की नहीं। जबकि अन्य भी उसी हैसियत के नेता हैं। इन नेताओं का यह भी कहना था कि भाजपा का फिलहाल भाग्य अच्छा चल रहा है। इसलिए परिणाम बेहतर मिल रहे थे। 


लेकिन पिछले 10 सालों में कई पुराने कद्दावर नेताओं को लगातार निष्क्रिय रहने के लिए मजबूर सा कर दिया गया। जिन नेताओं ने भाजपा को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई अब उन्हें कांग्रेस से आकर भाजपा में स्थापित होने वाले नेताओं के आगे-पीछे चक्कर लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा। जो नेता ऐसे नेताओं के पीछे नहीं गया तो उसे हासिए से बाहर कर दिया गया। 

दो विधायक तो खासा खफा

वर्तमान में रीवा जिले के दो विधायक अपनी ही पार्टी के संगठनात्मक कार्यकलापों से खासा खफा हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि इन दोनों विधायकों को पिछले 10 सालों से लगातार नजर अंदाज किया जा रहा था। इन दोनों विधायकों के मुख्यमंत्री कमलनाथ से मिलने के बाद अफवाहें भी उड़ी। सत्यता यह है कि ये नेता पार्टी तो नहीं छोड़ेंगे, लेकिन इतना सत्य है कि उक्त दोनों विधायकों ने प्रदेश अध्यक्ष से भी सीधे-सीधे कह दिया है कि जिस तरह की गतिविधियां रीवा जिले में चल रही हैं और समान व्यवहार नहीं हो रहा है निश्चित तौर पर वह गलत है। 

असर पड़ा सदस्यता अभियान पर

आपसी बेरूखी का नजारा इस बार पार्टी की सदस्यता अभियान पर भी देखने को मिला है। यही कारण है कि रीवा जिले के लिए संगठन ने जो लक्ष्य दिए थे उसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है। उल्लेखनीय है कि पार्टी संगठन ने हर विधानसभा क्षेत्र से 25 हजार नए सदस्यों के सृजन का लक्ष्य दिया था। लेकिन किसी भी विधानसभा में 8 से 10 हजार नए सदस्यों तक ही सबकुछ सिमट गया। यहां यह भी गौरतलब है कि जिले का सदस्यता प्रभारी जिन्हेंं बनाया गया था वह भी उन्हीं नेताजी के खेमे में गिने जाते हैं। लिहाजा अन्य नेताओं ने भरपूर सपोर्ट नहीं किया और उसका परिणाम नकारात्मक चला गया। 

No comments