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बसपा को मजबूत बनाने पार्टी ने बढ़ाई सक्रियता, पहली बार पटेल वर्ग का पत्ता हुआ साफ रीवा में

रीवा। विंध्य क्षेत्र में काफी दिनों तक शक्तिशाली दल के रूप में रहने वाली बहुजन समाज पार्टी इन दिनों दयनीय अवस्था में है उसके ना तो जनप्रतिनिधि है और न ही बड़े नेता। हालत यह है कि वर्तमान में बहुजन समाज पार्टी को अब नेता ढूंढने पड़ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा चल रही थी कि बहुजन समाज पार्टी अपने पुराने नेताओं को वापस लाने डोरे डाल रही है लेकिन हाल फिलहाल पार्टी के रणनीतिकारों ने कई फेरबदल किए हैं, जिसमें प्रमुख मुद्दा यह है कि विंध्य के इतिहास में पहली बार पटेल वर्ग को नई नियुक्तियों में जगह नहीं दी गई है। 

सूत्र बताते हैं कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती यहां के प्रदर्शन से खासा खफा थी लिहाजा उन्होंने उन पुराने लोगों को भी दरकिनार कर दिया है। जो खयाली पुलाव पकाते हुए तमाम दावे किए थे। इस बार के चुनाव में तो पार्टी की हालत इतनी दयनीय हो गई कि विधानसभा में उसे एक भी सीट नहीं मिली वहीं लोकसभा चुनावों में 1 लाख वोटों के आसपास ही प्रत्याशी को सिमट जाना पड़ा। लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी ने जिन नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी थी वह भी लगभग किनारे से हो चुके हैं। यहां यह बता दें कि उन नेताओं ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसमें यह दावा किया था कि पार्टी की स्थिति बहुत बेहतर रहेगी। 
यदि जीतेंगे नहीं तो हार का अंतर बहुत ही कम रहेगा। लेकिन हुआ इसके उलट। पार्टी के प्रत्याशी को महज एक लाख से भी कम मत मिले, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि पार्टी का जनाधार जहां कम हुआ है वहीं वरिष्ठ नेताओं की रणनीति पूरी तरह से फेल रही। जिससे पार्टी सुप्रीमो मायावती बिफर गई थी। चुनाव के 2 महीने बाद जब पार्टी के वरिष्ठ नेता एक साथ बैठे और मंथन किया तो यह समझ में आया कि पार्टी के नेताओं की हवा-हवाई कार्यशैली के चलते यह स्थिति बनी है। 
लिहाजा ऐसे नेताओं को किनारे करने का भी निर्णय लिया गया। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया है कि पुराने जो नेता पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं उन्हें मना पटाकर एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी में ही समाहित किया जाए। इस अवस्था में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कई पुराने नेता अगले एक 2 महीने के भीतर अपने पुराने दल में आने का मन बना सकते हैं। 

पटेल वर्ग का वर्ग का पत्ता साफ होता दिख रहा

 काबिले गौर तथ्य है कि 1989 से अब तक के दौर में बहुजन समाज पार्टी में लगातार पटेल वर्ग का दबदबा कायम रहा है। लोकसभा चुनाव तो पटेल वर्ग के अलावा किसी ने लड़ा ही नहीं। वहीं विधानसभा चुनावों में अजा सीट सुरक्षित में ही केवल इस वर्ग के नेता को टिकट दी जाती रही। शेष में अन्य वर्ग ही चुनाव लड़ता रहा। सोशल इंजीनियरिंग के तहत कई बार ब्राह्मण ठाकुर भी मैदान में उतरे, इसकी वजह से बहुजन समाज पार्टी का बेस वोट खिसकता चला गया। अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों का मानना था कि हमारी ही पार्टी में हमारा कोई अस्तित्व नहीं रह गया है। लिहाजा वह भी बसपा से कटता चला गया। इन सब बातों को मद्दे नजर रखते हुए पार्टी ने एक बार फिर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को पार्टी में प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। अभी हाल में विंध्य क्षेत्र के सभी जिलों में पार्टी ने पुनर्गठन किया है जिसमें केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का ही नाम शामिल है। यहां यह बता दें कि पार्टी ने जिला अध्यक्ष के रूप में अमित साकेत उर्फ कर्नल को जिम्मेदारी सौंपी है, जबकि पूर्व अध्यक्ष अच्छेलाल निराला को जोन प्रभारी बना दिया गया है। इसी प्रकार सतना जिले में रामायण चौधरी को अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है, जबकि यहां से जोन प्रभारी के रूप में रमेश चौधरी को तैनात किया गया है। इसी प्रकार पार्टी ने पूर्व जिला अध्यक्ष उमेश साकेत, रामसुंदर कोल को भी जोन प्रभारी बनाया है। इन स्थितियों में अगर यह कहा जाए कि बहुजन समाज पार्टी को अब पटेल वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ेगी तो गलत नहीं होगा।

अब क्या होगा बसपा का रीवा में 

बहुजन समाज पार्टी का अपना एक अलग अस्तित्व रहा है, पार्टी में जब एकजुटता हुआ करती थी तो रीवा जिले की सात विधानसभा सीटों में 3 सीटों पर बहुजन समाज पार्टी का कब्जा हुआ करता था। खास बात यह थी कि पार्टी का बेस वोट पार्टी के साथ हुआ करता था। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं पार्टी का जो बेस वोट अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से था उसका झुकाव धीरे-धीरे बसपा से हटकर अन्य दलों की ओर हो गया है। जिसकी वजह से पार्टी की हालत अत्यंत गंभीर हो चुकी है। सतना और रीवा जिले में जहां पार्टी एक प्रमुख दल के रूप में मानी जाती थी, अब वही स्थितियां इसके विपरीत हो चुकी है। पार्टी के रणनीतिकारों ने काफी कुछ बदलाव का प्रयास तो किया है लेकिन देखना यह है कि आने वाले दिनों में इसका किस हद तक प्रभाव पड़ेगा?

बसपा ने दिए तीन सांसद, तीनों पटेल वर्ग से 

यहां यह बताना जरूरी है कि बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक लोकसभा चुनाव के लिए केवल पटेल वर्ग को ही टिकट दिया था इसमें से तीन बार बसपा की जीत भी हुई। जो सांसद बने वह तीनों पटेल वर्ग से थे। पहले सांसद के रूप में भीम सिंह पटेल वर्ष 1991 में जीते थे उसके बाद 1996 में बुद्धसेन पटेल ने जीत हासिल की थी। इसके बाद हुए चुनावों में बसपा लगातार हारती रही, लेकिन टिकट पटेल वर्ग से ही मिलती रही। बाद में 2009 के साल में जब लोकसभा चुनाव हुए तो बसपा सांसद के रूप में देवराज पटेल चुने गए थे।

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