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अपने पांव में खुद कुल्हाड़ी मार रही कांग्रेस

 रीवा। लगता है कांग्रेस अपने पांव में कुल्हाड़ी खुद मारने में लगी हुई है। रीवा में कम से कम यही दिखाई दे रहा है। गुटबाजी, सीनियरों की उपेक्षा और आमजनता से दूरी। ये तीन मुद्दे कांग्रेस को पनपने नहीं दे रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में तीन ऐसे कार्यक्रम हुए जिससे कांग्रेस का कार्यकर्ता ही कांग्रेस की खिलाफत करता सुनाई दिया। अलबत्ता कांग्रेस और कांग्रेसी संभवत: किसी की सुनते भी तो नहीं। लगातार जनता द्वारा उपेक्षित कर दिए जाने के बावजूद भी उनकी कार्यशैली में सुधार आने का नाम नहीं ले रहा है। 

गत दिवस रीवा में एक बैठक जहां हुई वहां चंद नेता पहुंचे और अपनी-अपनी बातें करना शुरू कर दिए। खास बात तो यह थी कि घर में बुलाई गई बैठक का मुख्य अतिथि भी घर का ही मुखिया था। संयोग यह था कि उनके बाबा और पिताजी मप्र की राजनीति में कद्दावर नेता के रूप में गिने जाते रहे। लेकिन अब नए-नवाढ़े राजनीति में तीसरी पीढ़ी के आए उस युवा ने भी अपने को कद्दावर नेता मानते हुए घर पर बैठक बुला ली। बैठक में अधिकांश वही लोग थे जो पहले उनके बाबा और पिता के निकटतस्थों में गिने जाते थे। बाकी नेताओं ने अपनी दूरियां बनाए रखी और तो और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि इस मामले में कांग्रेस संगठन ने भी अपनी दूरी बनाए रखी। संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों को बैठक के बारे में ज्ञात ही नहीं था। रीवा शहर के 16 कांग्रेस पार्षदों में से महज 4 पार्षद ही पहुंचे। 

जबकि नगरीय निकाय चुनाव तैयारी बैठक का नाम दिया गया था। तत्संबंधी युवा नेता के एक करीबी ने तो वहां पर संगठन के पदाधिकारियों को हटाने की मांग करते हुए नए नेताओं की नियुक्ति कराने तक की बात कर डाली। क्या ऐसे में कांग्रेस संगठन मजबूत होगा। सूत्र बताते हैं कि रात में ही पूरे मामले की जानकारी प्रदेश संगठन कार्यालय को दे दी गई है। इस मामले में प्रदेश संगठन क्या रूख अपनाता है यह तो समय बताएगा। लेकिन इतना जरूर है कि शहर में कांग्रेस की मटिया पलीद करने में उसी पार्टी के लोग पूरी ताकत के साथ यह प्रयास कर रहे हैं कि संगठन का वजूद कुछ नहीं है। कांग्रेस के नेता कहने लगे हैं कि पहले की स्थितियां कुछ और थी जब उस समय के नेता के आव्हान पर अधिकांश लोग घर की बैठक में शामिल हो जाते थे। फिर उक्त युवा नेता किसी का सीनियर नहीं है कि घर पर बैठक बुलाए और सब एक बुलावे पर वहां पहुंच जाएं। 

कब तक इंतजार कराओंगे...

कांग्रेस के बड़े नेताओं की हालत यह है कि उन्हें इंतजार कराने में बहुत मजा आता है। पिछले दिनों 8 अगस्त को जो वाक्या हुआ उससे कांग्रेसी अपने ही कांग्रेसी नेताओं से खासा खफा है। हुआ यह था कि प्रभारी मंत्री का दौरा कार्यक्रम था। सायं 6 बजे से राजनिवास में आम नागरिकों और जनप्रतिनिधियों से मिलने का समय निर्धारित किया गया था। लेकिन प्रभारी मंत्री की व्यस्तता ऐसी बढ़ी कि समय से चार घंटे विलंब से वे पहुंचे। डभौरा, त्योंथर, हनुमना जैसे दूरस्थ इलाकों से आए लोगों में से आधे तो बिना मिले ही चले गए। उल्लेखनीय है कि प्रभारी मंत्री शाम 6 बजे की जगह रात 10 बजे राजनिवास पहुंचे थे। उसमें भी भीड़ इतनी कि वे किसी से बात नहीं कर पा रहे थे और न ही लोग अपनी समस्या बता पा रहे थे।

 ले-देकर लगभग साढ़े 11 बजे तक एक हजार लोगों से आवेदन लिया और दो-दो सेकण्ड में सबकी समस्या का समाधान हो गया। बोरा में भरकर आवेदन पैक कराए। अब वह आवेदन भोपाल गए या जबलपुर या फिर बीहर नदी। मतलब डेढ़ घंटे के भीतर एक हजार लोगों की समस्या का समाधान। कांग्रेसी पीछे बैठकर गालियां दे रहे थे कि जब समय निर्धारित रहता है तो उस समय का पालन क्यों नहीं होता। 10-20 मिनट आगे-पीछे होना कोई बड़ी बात नहीं होती। लेकिन चार घंटे कौन इंतजार करेगा। कांग्रेसी आपस में ही खुसुर-फुसुर करते रहे कि जितने दिन चल रहा है चलने दो। नाराजगी इस बात को लेकर भी हो रही थी कि मिलने का कोई सिस्टम ही नहीं था। रेलमपेल, धक्कम-धक्की में लोग क्या समस्या सुनाएंगे? 

नहीं था कोई सीनियर लीडर

प्रभारी मंत्री के राजनिवास में मुलाकाती कार्यक्रम में कोई भी सीनियर लीडर वहां मौजूद नहीं था। कुल जमा 3-4 नेता थे जो पुलिस की भूमिका में थे और भीड़ को सम्हालने के साथ लोगों को डांटते-फटकारते किनारे कर रहे थे। यहां भी गुटबाजी का क्रम देखने को मिल रहा था। प्रभारी मंत्री सबको संतुष्ट करने में जुटे तो रहे लेकिन ऐसा संभव ही नहीं। वहीं लोग कह रहे थे कि प्रभारी मंत्री अगर महीने में कम से कम दो बार रीवा आएं और केवल जनसमस्या की सुनवाई करें तभी भीड़ कन्ट्रोल हो पाएगी। नहीं तो अगली बार कहीं जूतम-पैजार की नौवत न आ जाए। सत्यता तो यह है कि कांग्रेस का यहां कोई जनप्रतिनिधि अब हैं नहीं कि परेशान भीड़ उस दरवाजे में भी जाकर अपनी समस्या का निराकरण कराए। ले-देकर प्रभारी मंत्री से ही लोगों को आशा बची है। अब अगर वे 60 दिन में यहां की जनता को 60 मिनट देंगे तो उसका परिणाम क्या होगा?

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