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कांग्रेस का सपना कैसे हो पायेगा साकार,क्या महापौर बना पायेंगे अबकी बार?

 रीवा। आगामी तीन महीने बाद एक बार फिर नगर सरकार बनाने को लेकर गहमा-गहमी का दौर शुरू होगा। पिछले पांच निर्वाचित महापौर भाजपा के ही रहे हैं। निर्वाचन में कांग्रेस को लगातार मात खानी पड़ी है। हर बार कांग्रेस का प्रत्याशी बड़ी दमखम के साथ चुनाव तो लड़ता है लेकिन उसका वोट प्रतिशत बढऩे की बजाय घटता ही रहा है। कांग्रेस के कई दिग्गज चुनाव लड़े लेकिन भाजपा के सामान्य प्रत्याशी के आगे भी वे बौने से साबित हुये। लेकिन एक बार फिर महापौर पद के लड़ाके  कांग्रेसी सक्रिय होने लगे हैं। 
कांग्रेस का सपना कैसे हो पायेगा साकार,क्या महापौर बना पायेंगे अबकी बार?

साल के अंत में या फिर नये साल की शुरूआत में नगरीय निकाय चुनाव होना तय ही माना जा रहा है। अभी इसके लिये लगभग पांच महीने का समय शेष है। लेकिन चुनाव लडऩे की इच्छा रखने वाले नेताओं की कुलबुलाहट शुरू होने लगी है। दावेदारों की संख्या भी एक दर्जन से ज्यादा है। जो पिछले चुनावों में हार चुके हैं एक ओर जहां वे भी दावेदार हैं वहीं दूसरी ओर नये दावेदारों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कुछ लोग जहां नगरीय निकाय मंत्री के पास अपना जुगाड़ फिट करने का प्रयास शुरू कर चुके हैं वहीं कई नेता संगठन के मार्फत सीधे मुख्यमंत्री से इस संबंध में अभी से सम्पर्क बनाना चालू कर दिये हैं। महापौर के लिये कौन उपयुक्त दावेदार रहेगा इसके लिये कांग्रेस संगठन अंत में निर्णय लेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान में रीवा जिले की कांग्रेस के भीतर व्यापक अन्तरद्वंद का माहौल बना हुआ है। साथ ही सीनियर नेता एक ओर जहां उपेक्षित महसूस करते हुये वर्तमान टीम का खुल कर विरोध करते हैं तो वहीं दूसरी ओर रीवा के चुनावों की खास बात यही रही है कि कांग्रेस को हरवाने के लिये कांग्रेसी ही सक्रिय हो जाते हैं। 

परिसीमन के बाद बढ़ जायेंगे पार्षद

सूत्र बताते हैं कि नगर निगम क्षेत्र के परिसीमन की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है। अगर इसमें विशेष बाधाएं न आई तो आने वाले दिनों में रीवा नगर पालिक निगम क्षेत्र में 60 से ज्यादा पार्षद निर्धारित होंगे। फिलहाल रीवा नगर पालिक निगम में कुल 45 पार्षद निर्वाचित रूप से काम कर रहे हैं। जिसमें 14 पार्षद कांग्रेस के निर्वाचित हुये थे। जबकि भाजपा के 27 थे। माकपा, बसपा, सपा से एक-एक पार्षद तथा एक निर्दलीय पार्षद थे। बाद में यह स्थिति बदली और बसपा का पार्षद कांग्रेस का दामन थाम लिया तो भाजपा की भी एक महिला पार्षद ने पार्टी छोड़ कांग्रेस का साथ अपना लिया। फिलहाल कांग्रेस के पास 16 पार्षद और भाजपा के पास 26 पार्षद हैं। 

सीधे चुनाव में लगातार महापौरी जीत रही भाजपा

यहां यह उल्लेखनीय है कि जब से महापौर का निर्वाचन सीधे आम जनता के मार्फत होने लगा है तब से कांग्रेस का पत्ता लगभग साफ सा हो गया है। सीधे निर्वाचन प्रक्रिया में कांग्रेस को कभी जीत हासिल नहीं हुई। त्रिस्तरीय नगरीय चुनावों के शुरूआती दौर में पार्षदगण ही महापौर चुनते थे। लेकिन इस अध्यादेश पर संशोधन वर्ष 1998 में हुआ जिसमें सर्व प्रथम चुनाव में भाजपा के राजेन्द्र ताम्रकार निर्वाचित हुये थे। उसके बाद क्रमश: आशा सिंह, वीरेन्द्र गुप्ता, शिवेन्द्र पटेल तथा श्रीमती ममता गुप्ता के खाते में महापौरी आई। वहीं एक बार फिर यह चर्चा जोरों पर है कि आगामी दिनो के चुनावों के लिये नये सिरे से दिशा-निर्देश बनाये जा रहे हैं और एक बार फिर पार्षदगण ही नया महापौर चुनेगें?  

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