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कहां गुम हो गई रीवा की यूथ कांग्रेस?

रीवा। कांग्रेस की मुख्य रीढ़ युवा कांग्रेस फिलहाल गुम सी है। ऊपर से लेकर नीचे तक युवा कांग्रेस का न तो कोई कैलेण्डर है और न ही राजनैतिक रणनीति। प्रदेश अध्यक्ष से लेकर रीवा जिला अध्यक्ष तक की स्थिति यह है कि उन्हें 80 फीसदी से ज्यादा युवा कांग्रेस कार्यकर्ता ही नहीं जानते। इन हालातों में निश्चित तौर पर कांग्रेस की मटिया-पलीद होना स्वाभाविक है। फिलहाल युवा कांग्रेस में पदधारियों की संख्या काफी है। लेकिन जमीनी तौर पर युवा कांग्रेस के पदाधिकारी दिखाई नहीं दे रहे हैं। चुनाव के दौरान भी उनका अस्तित्व समझ से परे था। 

पहले की युवक कांग्रेस और वर्तमान की युवा कांग्रेस में धरती-आसमान का अन्तर समझ में आ रहा है। मुकेश नायक के जमाने की युवक कांग्रेस का कद मूल कांग्रेस के बराबर ही बन गया था। युवक कांग्रेस के जिला अध्यक्ष की स्थिति काफी बेहतर हुआ करती थी। रीवा में युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बतौर मुकेश श्रीवास्तव, अनुपम तिवारी, सुबोध पाण्डेय, राकेश पाण्डेय का कार्यकाल अभी भी लोगों के जेहन में है। लेकिन 2003 के बाद के कार्यकाल में आये युवक कांग्रेस अध्यक्षों में लोग केवल सुखेन्द्र सिंह बन्ना को ही याद कर पा रहे हैं। उसके बाद के युवा कांग्रेस अध्यक्षों का नाम ही लोगों को या तो याद नहीं है या फिर जानते नहीं हैं। 
सवाल यह उठता है कि युवा कांग्रेस की स्थिति अचानक ऐसी क्यों हो गई हैं। 
इसका जबाव भी स्थानीय कांग्रेस के पदाधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बड़े ही संजीदगी तरीके से देते हैं। इनका कहना यह था कि पहले कालेजों का चुनाव होता था और वहां जीतने या हारने वाले कद्दावर छात्र नेताओं को एनएसयूआई में इन्ट्री कराई जाती थी। इसके बाद उन्हें यूथ कांग्रेस में शामिल किया जाता था। काफी मशक्कत और राजनीति में अर्ध परिपक्व होने पर यूथ कांग्रेस की कमान सौंपी जाती थी। साथ ही स्थानीय राजनेता भी भरपूर सपोर्ट करते थे। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि पिछले कुछ कार्यकालों से युवा कांग्रेस में अध्यक्ष अब वही बन रहा है जो किसी बड़े नेता के करीब जा बैठता है। वर्तमान में यही स्थिति पिछले तीन कार्यकालों से देखने को मिल रही है। सूत्र कहते हैं कि स्थानीय युवा कांग्रेस के नेता भी वही कर रहे हैं जो उनका शीर्षस्थ नेतृत्व कर रहा है। वर्तमान युवा कांग्रेस के अध्यक्ष कुणाल चौधरी विधायक भी है लेकिन उनकी गतिविधियां ले-दे कर केवल उनके वरिष्ठ नेता जीतू पटवारी तक ही शामिल हैं। यहां यह बता दें कि जीतू पटवारी की कृपा से ही कुणाल चौधरी युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने और उसी कोटे पर विधानसभा की टिकट भी हासिल कर ली। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि श्री चौधरी ने अपने कार्यकाल में कम से कम विंध्य क्षेत्र में ऐसा कोई कार्यक्रम ही नहीं किया जिससे युवा आकर्षित हो सकते और स्थानीय युवाओं के करीबी बन सकते। लिहाजा युवा कांग्रेस शून्यता की स्थिति में पहुंच गई है। इसके साथ ही दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि स्थानीय युवा कांग्रेस के पदाधिकारी युवाओं के मामले में ही कन्नी काट रहे हैं। 
गौरतलब है कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में युवा बेरोजगारी का मुद्दा खूब उठा था और उसे जन समर्थन भी मिला था। चुनाव के दौरान 65 फीसदी युवाओं को आकर्षित करने के लिये भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने ऐड़ी-चोटी का जोर भी लगाया। इसका फायदा कांग्रेस को मिला। लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि चुनाव के दौरान युवा कांग्रेस की टीम सशक्त रूप से मैदान में नहीं दिखी और भाजपा का युवा मोर्चा तरीके से युवा कांग्रेस के काफी आगे निकल गया और कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। कमोबेश यही स्थिति लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिली।

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