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अपनी विरासत भी नहीं बचा पाए नेता पुत्र?

रीवा। सामान्य तौर पर यह देखा जाता है कि राजनीति में रहने वाले नेताओं के पुत्र भी अधिकांशत: राजनीति में ही आ जाते हैं और विरासत को आगे बढ़ाने का पूरा प्रयास करते हैं। एक ओर जहां वे अपने पिता का नाम रोशन करते हैं वहीं समाज सेवा के माध्यम से जन समस्याओं का भी निवारण करते हैं। लेकिन विंध्य की राजनीति में नेता पुत्र का दबदबा विशेष तौर पर देखने को नहीं मिला। इक्का-दुक्का नेता ही ऐसे रहे जिनके पुत्रों ने विरासत की राजनीति को क्रमश: आगे बढ़ाया। 
अपनी विरासत भी नहीं बचा पाए नेता पुत्र?

हम बात करेंगे विंध्य प्रदेश की शुरूआती राजनीति से जब जमुना जोशी श्रीनिवास का जलजला हुआ करता था। उन दिनों की राजनीति कुल जमा आधा दर्जन लोगों में ही विशेष तौर पर सिमटकर रहा करती थी। पूर्व सांसद स्व. यमुना प्रसाद शास्त्री एक प्रखर समाजवादी नेता के रूप में पूरे भारत वर्ष में जाने जाते थे। उनके न रहने के बाद अब उनकी राजनैतिक विरासत सम्हालने वाला कोई नहीं दिखता। मतलब कि उनके इकलौते पुत्र देवेन्द्र शास्त्री का राजनैतिक अस्तित्व न के बराबर रहा। कुल मिलाकर वे पिता की बनाई पूंजी को ही आगे बढ़ाते हुए उसी से अपना संचालन कर रहे हैं। इसी क्रम में यदि हम बात करें प्रखर कांग्रेसी स्व. बृजराज सिंह तिवारी के परिवार की, तो उनके परिवार का भी कोई सदस्य अगली राजनीति में सक्रिय रूप से नहीं दिखाई दिया। मप्र में वन और राजस्व मंत्री के रूप में सालों तक सेवाएं देने वाले और कड़क मंत्री के रूप में चर्चित स्व. शत्रुघ्न सिंह तिवारी के परिवार से भी कोई राजनीति में सफल नहीं हो पाया। पुत्र डॉ. महेश तिवारी ने तो राजनीति की ओर देखना तक पसंद नहीं किया। विंध्य के चर्चित दलित नेता एवं पूर्व मंत्री स्व. छोटेलाल का भी परिवार राजनैतिक विरासत को सम्हाल पाने में असफल रहा। इसी प्रकार समाजवादी रहने के बाद कांग्रेस से 3 बार विधायक और दो बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल करने वाले स्व. रामखेलावन नीरत के पुत्रों में से कोई भी राजनीति के दूसरे पायदान तक पहुंचने में सफल नहीं हो पाए। 
जनता पार्टी शासनकाल में दो नेता खासा चर्चाओं में आए थे। जिनमें से एक थे स्व. सीता प्रसाद शर्मा और दूसरे थे स्व. प्रेमलाल मिश्रा। दोनों प्रखर नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन इन दोनों नेताओं के परिवार का भी कोई सदस्य राजनीति की पहली सीढ़ी तक भी नहीं पहुंच पाया। इसी क्रम में यदि हम बात करें सिरमौर के प्रखर नेता रामलखन शर्मा की तो उन्होंने पूरे प्रदेश में अपनी एक अलग पहचान बनाई। लेकिन अब उनकी भी विरासत सम्हालने वाला कोई नहीं दिखाई देता। जन संघ स्थापक सदस्यों में रहे त्योंथर विधायक स्व. त्रिवेणी प्रसाद मिश्रा और मऊगंज विधायक जगदीश मसुरिहा का नाम लेने वाला ही अब कोई नहीं है। हालांकि स्व. त्रिवेणी प्रसाद मिश्र के भाई सुशील मिश्रा कुछ समय तक भाजपा के जिला इकाई के अध्यक्ष थे लेकिन आपसी खींचातानी के चलते पार्टी वालों ने उन्हें त्योंथर में ही ले जाकर पटक दिया। जबकि जगदीश मसुरिहा के यहां से अब राजनीति करने वाला ही कोई नहीं है। उधर स्व. अर्जुन सिंह के कभी चहेतों में गिने जाने वाले स्व. मुनि प्रसाद शुक्ल के पुत्र का भी राजनैतिक सरोकार नहीं रहा। वे अपने व्यवसाय में संलग्नित हैं। 
जमाने तक स्व. श्रीनिवास तिवारी को मात देने वाले लालगांव स्टेट के प्रमुख रहे स्व. आरआर पी सिंह की अगली पीढ़ी भी राजनैतिक विरासत को सम्हाल पाने में असफल सी रही है। स्व. आरआर पी सिंह के सभी पुत्र खुद तो राजनैतिक वजूद बना पाने में सफल नहीं रहे लेकिन अभी भी कुछ गांवों में वे अपना जनाधार बनाए हुए हैं और चुनाव के दौर में हर दल का नेता उनकी ड्यौढ़ी जोहारने अवश्य जाता है। फिर भी यह कहा जाता सकता है कि आरआरपी सिंह की विरासत को उनका परिवार नहीं बचा पाया। 
15-85 की राजनीति के दम पर शिखर तक पहुंचने वाले नेताओं का परिवार भी राजनैतिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ पाने में असफल रहा। 1991 की संसद में बसपा का झण्डा लेकर अकेले बैठने वाले स्व. भीम सिंह पटेल की राजनैतिक विरासत को सम्हालने वाला अब कोई नहीं दिखाई दे रहा है। इसी प्रकार वर्तमान में भाजपा नेता व पूर्व सांसद बुद्धसेन पटेल के घर से भी अगली पीढ़ी के राजनैतिक कदम बढ़ते नहीं दिखाई दे रहे हैं। तीन बार विधायक रहे व विधायक दल के नेता रह चुके डॉ. आईएमपी वर्मा की अगली पीढ़ी भी राजनैतिक घटनाक्रमों से ज्यादा मतलब नहीं रखती है। दबंग दलित नेता स्व. जयकरण साकेत ने मप्र और छत्तीसगढ़ के साथ दिल्ली की राजनीति में विशेष पकड़ बनाई थी। लेकिन उनके न रह जाने के बाद अब उनकी राजनैतिक विरासत सम्हालने वाला कोई नहीं दिखाई देता। 

क्या कोई होगा विश्वम्भर पाण्डेय जैसा भी नेता

राजनीति के इस घटनाक्रम चर्चा में स्व. विशम्भर पाण्डेय का नाम यदि शामिल न किया जाए तो यह कम्युनिस्टी राजनीति के साथ अन्याय होगा। स्व. विशम्भरनाथ पाण्डेय विधायक तो केवल ढ़ाई साल ही रहे, लेकिन उस दौर की भाजपा सरकार की नाकों में दम कर रखा था। तबके मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा भी उनका व्यक्तिगत सम्मान करते थे। क्षेत्र में उनकी बुलंद आवाज को जनता यह कहती थी कि जब विशम्भर दहाड़ते हैं तो गुढ़ की आवाज भोपाल पहुंच जाती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उस कद का नेता अब है नहीं और दूसरा बड़ा दुर्भाग्य कि उनकी विरासत सम्हालने वाला अब उनके घर में कोई दिखता नहीं। 

चन्द्रमणि जब कहते थे मैं हूं परमानेंट सीएम 

77 के दौर में विधायक हुए चन्द्रमणि त्रिपाठी ने उस जमाने के मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सखलेचा को श्यामलाहिल्स के बंगले में ही ऐसी लताड़ लगाई थी कि उन दिनों के सारे मंत्री श्री त्रिपाठी से डरने लगे थे। श्री त्रिपाठी का शुरू से लेकर अंत तक यही डॉयलॉग रहता था सीएम तो परमानेंट हूं। मेरे पिता ने ही मेरा नाम चन्द्रमणि यानी सीएम रख दिया है। तब से लेकर प्रखर नेताओं में गिने जाने वाले तथा भाजपा से दो बार सांसद रहे स्व. चन्द्रमणि त्रिपाठी ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई थी। लेकिन दुर्भाग्य से वे न रहे और उनके इकलौते पुत्र ने भी समय से पहले ही दुनिया को छोड़ दिया। बिटिया प्रज्ञा उनकी राजनीति को आगे बढ़ाने का प्रयास तो कर रही है, लेकिन राजनीति में उनका भी शायद कोई सगा नहीं इसलिए जहां वो आगे बढऩे का प्रयास करती है तो उनके लोग ही लित्ती मार देते हैं। लिहाजा वह आगे नहीं बढ़ पा रही। 

विरासत को आगे बढ़ाया इन नेताओं ने

राजनैतिक विरासत को बचाए रखना कोई हंसी-मजाक का खेल नहीं है। जन सेवा में लगातार जुटे रहना सबके बस की बात नहीं है। हम बात कर रहे हैं स्व. अर्जुन सिंह और स्व. श्रीनिवास तिवारी की। स्व. अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह राहुल ने आज भी विरासत को सम्हालने के साथ उसको शनै: शनै: आगे ही बढ़ाया है। इसी क्रम में स्व. श्रीनिवास तिवारी के पुत्र स्व. सुन्दरलाल तिवारी ने भी राजनैतिक विरासत को सम्हाल ही लिया था, लेकिन असमय काल चक्र के चक्रव्यूह में फंसकर वे इस दुनिया को छोड़ गए। अब नाम आता है स्व. इन्द्रजीत पटेल का। जिनके पुत्र कमलेश्वर पटेल वर्तमान में कैबिनेट मंत्री के रूप में मप्र में सेवाएं दे रहे हैं। उधर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्व. गोविंद नारायण सिंह के पुत्रों ने भी उनकी राजनैतिक विरासत को बेहतर ढंग से सम्हाला। दो बेटे जहां विधायक और मंत्री रह चुके हैं, वहीं उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए रामपुर बघेलान से अब उनका नाती विक्रम सिंह भी विधायक के रूप में जन सेवा कर रहे हैं। उधर सतना के दबंग नेता स्व. गुलशेर अहमद के पुत्र सईद अहमद ने भी कुछ हद तक विरासत को सम्हालने का प्रयास किया। सईद अहमद राज्यस्तर पर मंत्री भी रह चुके हैं।

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