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कहां गायब हो गये कांग्रेस के रणबाकुरे?, रीवा में कौन है कांग्रेस की दुर्दशा का जिम्मेदार

 रीवा। एक समय था जब रीवा में कांग्रेस की ही हर तरफ तूती बोलती थी। स्थितियां यह थी कि थाना और तहसीली में कांग्रेस का अदना सा भी नेता अफसरों को हड़का देता था। कांग्रेस ने पिछले 30 सालों में नेताओं को उपकृत करते हुये बड़ा नेता तक बना दिया। लेकिन ये नेता ही आगे बढ़ पाने में सफल न हो पाये, जनता के सामने नकारा सा साबित हो गये।

 जिन्हें कांग्रेस ने रणबांकुरा माना था वे फिसड्डी से दिखने लगे। अब कांग्रेस के पास केवल नामदार नेता बचे हैं, कामदार नेता लापता हो चुके हैं या फिर दूसरे दलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 
उल्लेखनीय है कि 80 से लेकर 2000 के शुरूआती दशक तक कांग्रेस का खासा दबदबा रहा करता था। राजनीति में राजनेताओं की ऐसी दखल थी कि कोई और पनप नहीं पाता था। ऐसे-ऐसे लोग अचानक विधायक बन गये जिनकी जनता के बीच कोई छवि नहीं थी। वहीं नेताओं ने कांग्रेस के जमाने में ऐसे लोगों को भी कांग्रेस की टिकट दिलाई जिनका न कोई जनाधार था और न जनता से सरोकार था। चुनाव लडऩे के बाद तो वे नेता परिदृश्य से पूरी तरह गायब ही हो चुके हैं। पांच-आठ हजार वोट पाकर चुनाव लडऩे की हसरत तो पूरी कर ली लेकिन जिन पांच-आठ हजार लोगों ने उन्हें समर्थन दिया था, उनकी नजरों से भी गिर गये। 
रीवा की पिछली राजनैतिक स्थितियों पर अगर गौर किया जाये तो यह दिखाई देता है कि कांग्रेस के जीरों में आने की भूमिका वाली इबारत वर्ष 1998 में ही लिख दी गई थी। यहीं से रीवा जिले में कांग्रेस के पतन का दौर शुरू हुआ था। उस दौरान रीवा जिले की सात विधानसभा में कांग्रेस की सिम्बल वाली टिकट कुर्ते की जेब से निकाल कर दे दी गई थी। ऐसे लोग भी विधानसभा का चुनाव लड़े जिनका कोई जनाधार नहीं, जनता से सरोकार नहीं। जनता ने भी पांच से आठ हजार के बीच वोट देकर कांग्रेस को निपटा दिया। उस दौरान देवतालाब से अरुण पटेल, मऊगंज से मंजूलता तिवारी, राकेश रतन सिंह, गुढ़ से बृजभूषण शुक्ला, संजीव मोहन गुप्ता, साधना कुशवाहा, मनगवां आरक्षित से कृष्णप्रिय मैत्रेय, त्रिवेणी मैत्रेय जैसे नेताओं को मैदान में उतार दिया गया था। सभी की हार तो हुई ही, इसमें अधिकांश कांग्रेसी लड़ाकों की जमानत जब्त हो गई थी। गुटबाजी बढऩे का सिलसिला भी इसी दौर से शुरू हुआ जो आज तक बरकरार है। 2003 में कांग्रेस शून्य की स्थिति में रही तो एक बार फिर कांग्रेस शून्य की ओर बढ़ गई। 

दिल जीतने का जज्बा चाहिये?

जितने नेताओं को कांग्रेस ने उपकृत किया अगर वे लगातार जनता से जुड़ाव रखते तो निश्चित तौर पर उनकी स्वयं की और कांग्रेस की छवि बेहतर बनती। लेकिन हार का हार पहनने के बाद इन नेताओं ने जनता से ऐसी दूरी बनाई कि जनता ने उनसे पूरी दूरी बना ली। खास बात यह है कि कांग्रेस के अधिकांश नेता केवल टिकट मिलने के बाद ही मैदान में उतराते हैं, जबकि राजनीति में प्रतिदिन लोगों से सम्पर्क अगर न हो तो जन समस्याओं का निराकरण हो नहीं सकता।  राजनीति में वही सफल हो सकता है जो लगातार जनमानस के सम्पर्क में रहे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कांग्रेस में इक्का-दुक्का नेता ही ऐसे बचे हैं जो जनता के बीच आ-जा रहे हैं। शेष तो भोपाल की राजनीति को बेहतर बनाने में जुटे हैं।  

वर्तमान में बढ़ी सक्रियता

प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद एक बार फिर कांग्रेसी नेताओं की सक्रियता रीवा से भोपाल के बीच बढ़ गई है। हालांकि प्रदेश स्तर में भी इन नेताओं की पूछ-परख न के बराबर ही है। लेकिन अपने घर वालों व चहेतों के काम जरूर आ रहे हैं। वहीं सूत्र बताते हैं कि गुटबाजी के चलते रीवा की स्थानीय स्थानांतरण सूची भी अटकने की स्थिति में है। क्योंकि एक नेता कर्मचारी के विरोध में है तो दूसरा पक्ष में। वहीं कोई जनप्रतिनिधि है नहीं, लिहाजा भूतपूर्व प्रत्याशियों के लेटरपैड का उपयोग चल रहा है। 

अधिकारी भी गंभीर नहीं 

रीवा जिले में तैनात किये गये अफसर भी स्थानीय कांग्रेसियों के लिये गंभीर नहीं है। नेता अगर काम लेकर पहुंचता है तो जितना जायज होता है वह सुन लेता है और करता है। वहीं अगर कांग्रेसी दबाव बनाने का प्रयास करता है तो अफसर मुस्कुरा कर टहला देता है। हालांकि रीवा में अभी भी भाजपा का ही राज है। आठो विधायक भाजपा के हैं लिहाजा अफसरों की मजबूरी है कि उनकी सुने। नगर निगम में तो भाजपा की सरकार ही चल रही है। वहां पर कांग्रेसियों की सुने जाने का सवाल ही नहीं उठता। उधर कई जगह कांग्रेसियों द्वारा अधिकारियों से सीधे यह कह दिया जाता है कि आप नहीं करोगे तो मंत्री जी करेंगे। वहीं अफसर भी जबाव देते हैं कि आप का कहना सही है, मंत्री जी जब आदेश ही कर देंगे तो क्या बात है? 

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