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पांच हजार की रिश्वत लेते एसडीएम को लोकायुक्त ने पकड़ा

रीवा। लोकायुक्त पुलिस ने अनुविभागीय अधिकारी राजस्व पाली जिला उमरिया को पांच हजार की रिश्वत लेते हुये रेड हैण्ड पकड़ा है। वे उमरिया जिले के पाली अनुभाग में पदस्थ थे। उल्लेखनीय है कि आरोपी एसडीएम नीलाम्बर मिश्रा रीवा जिले के तिवनी चौथियान के निवासी हैं। अभी उनकी नौकरी बहुत समय की नहीं हुई थी किन्तु लालच ने इस तरह से घेर लिया था कि उसका अंत भ्रष्टाचार के प्रकरण से हुआ। सामान्यत: किसी भी अफसर के साथ पुलिस या होमगार्ड इसलिये पदस्थ किया जाता है कि वह उसकी सुरक्षा करेगा। किन्तु भ्रष्ट अधिकारी सैनिकों को भी भ्रष्ट बना सकते हैं।

 इस घटना में यही हुआ। फरियादी जब वायदे के अनुसार रिश्वत देने पहुचा तो अनुविभागीय अधिकारी श्री मिश्रा ने रिश्वत की राशि अपने होमगार्ड सैनिक चन्द्रभान सिंह को देने को कहा। इस तरह से जरिये सैनिक रिश्वत की राशि एसडीएम तक पहुच गई। इसी दरम्यान लोकायुक्त ने आरोपियों को दबोच लिया। 

मांग थी दस हजार महीने की 

घटना के संबंध में बताया गया है कि शिकायतकर्ता खगेन्द्र सिंह निवासी ग्राम भौतरा के अनुसार आरोपी एसडीएम ने क्रेसर संचालन के लिये 10 हजार प्रतिमाह के हिसाब से मांग किया था। किन्तु शिकायतकर्ता के इस बात पर कि बरसात में क्रेशर का काम बंद रहता है सौदा 5 हजार महीने के हिसाब से तय हुआ था। 24 जुलाई 2019 को वही राशि दी गई। इसके पहले लोकायुक्त में शिकायत पहुच चुकी थी। लिहाजा अपनी तैयारियों के साथ लोकायुक्त पुलिस भी सक्रिय हो गई थी और मौके पर आपरेशन करने पहुच चुकी थी। इस कार्रवाई में निरीक्षक विद्यावारिधि तिवारी, हितेन्द्रनाथ शर्मा सहित 15 सदस्य शामिल रहे। प्रकरण में विवेचना जारी है।

रीवा में चलती है इनके नाम कोचिंग

रीवा शहर में आरोपी नीलाम्बर मिश्रा के नाम पर एक कोचिंग संस्था का भी संचालन किया जा रहा है। उनके डिप्टी कलेक्टर बनने के साथ ही उनका नाम कोचिंग संचालक ने मार्गदर्शक के रूप में लिखवा लिया था। इसको लेकर भी पूर्व में काफी चर्चा हुई थी। कोंचिंग संचालक व नीलाम्बर के बीच नाम लिखवाने के नाम पर क्या शर्तें तय थी यह भी नकदी सौदे पर ही आधारित रहा होगा। 

थम नहीं रहा राजस्व का भ्रष्टाचार

भाजपा शासन में भ्रष्टाचार के मामले में सबसे अधिक राजस्व विभाग ही चर्चाओं में था। राजस्व न्यायालयों में प्रकरणों का निराकरण रिश्वत की कीमत के आधार पर होता था। अन्यथा प्रकरण कई सालों तक लंबित पड़े रहते थे। इस पर जब कड़ाई हुई, समीक्षा हुई तो वास्तविकता सामने आई। तहसीलों से राजस्व मण्डल तक दबे प्रकरणों की तलास शुरू हो गई। अंतत: राजस्व प्रकरणों को आनलाईन करने के लिये आरसीएमएस लागू किया गया। निर्देश हुये कि सभी पुराने प्रकरणों को पोर्टल में दर्ज किया जाय और नये प्रकरणों का भी पंजीयन किया जाय। किन्तु राजस्व विभाग ने यहां की बेईमानी करने में सफल रहा। कुछ प्रकरणों को दर्ज करने के बाद कई पुराने प्रकरणों का नया पंजीयन पोर्टल में दिखा दिया गया। आज भी ऐसे कई प्रकरण तहसीलों में प्रचलन में हैं। जिनका निराकरण नहीं हो रहा है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद कहा गया था कि भ्रष्टाचारियों को बख्सा नहीं जायेगा। किन्तु इस तरह की घटनाओं से पता चलता है कि तहसीलों में एवं राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार कभी बंद होने वाला नहीं है। यहां तो जब तक मामला अंदर तभी तक ईमानदारी रहती है किन्तु जिस दिन खुलासा हो जाता है उस दिन बड़े-बड़े ईमानदार भ्रष्टाचारियों की  लाईन में खड़े नजर आते हैं।

भ्रष्टाचारी सचिव को चार साल की सजा

जनपद पंचायत रायपुर कर्चुलियान की ग्राम पंचायत भौवार की तत्कालीन सचिव सीता गुप्ता को विशेष न्यायालय रीवा ने चार साल की सजा सुनाई गई है। भ्रष्टाचार के प्रकरण में हुई सजा के साथ ही दो हजार रूपये अर्थदण्ड भी लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि सीता गुप्ता को २१ मई 2015 को लोकायुक्त रीवा द्वारा 5 हजार की रिश्वत लेते हुये पकड़ा गया था। 
चार साल बाद हुई सजा
अपचारी सचिव सीता गुप्ता के खिलाफ लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार अधिनियम के तह प्रकरण दर्ज कर विवेचना किया था। जहां सुनवाई के उपरान्त विशेष न्यायालय रीवा ने धारा 7 में तीन वर्ष का कारावास एवं धारा 13(१) डी सहपठित धार 13(२) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 में 4 साल की साजा सुनाया है। इस प्रकरण में 25 अप्रैल 2016 को चालान प्रस्तुत किया गया था। दिनांक 24 जुलाई 2019 को प्रकरण में सजा सुनाई गई। 
सीएम आवास के लिये मांगी थी रिश्वत
दोषी पंचायत सचिव सीता गुप्ता ने सीएम आवास की स्वीकृति के लिये फरियादिया शोकीना साकेत निवासी भौवार से 5 हजार की रिश्वत मांगा था। इसी मामले में उन्हें ट्रेप किया गया था। ज्ञात हो कि ग्रामीण विकास विभाग में चाहे वह हितग्राहीमूलक  योजनायें हों अथवा सामुदायिक विकास से संबंधित योजनायें हो सभी में व्यापक भ्रष्टाचार होता है। इसका गर्भ गृह ग्राम पंचायतें हैं। क्योंकि वही क्रियान्वयन एजेंसी होती हैं। पंचायत का सचिव या वर्तमान में रोजगार सहायक दो ऐसे पद हैं जो पंचायतों की हर योजनाओं के लिये सशक्त माध्यम होते हैं। सरपंच भी यदि चाहे तो इनकी असहमति से कुछ भी नहीं कर सकता। यही कारण है कि हर सरपंच इन दोनों को साधकर ही लूट में सहभागी बनता है। इन्हीं कमाऊ लोगों के माध्यम  से ऊपर भी मण्डी चढ़ती है। किन्तु ऐसे लोग विभागीय मामलों में अक्सर ही बच जाते हैं। क्योंकि वहां कार्रवाई के नाम पर अधिक हुआ तो वित्तीय मामले में राशि वसूली का आदेश हो जाता है। किन्तु वही प्रकरण जब लोकायुक्त या ईओडब्लयू जैसी एजेंसियों के संज्ञान पहुच जाता है तो बचना मुश्किल हो जाता है। फिर ट्रेप वाले प्रकरणों में तो बचने की गुंजाईस बहुत ही नगण्य होती है। बड़े-बड़े रसूकदार भी इससे नहीं बच पाते।  

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