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... तो बसपाईयों के करतूतों की खुल गई पोल, टिकट के खेल की कहानी सुन कर मायावती भी रह गईं सन्न

रीवा। विंध्य में बहुजन समाज पार्टी को लगभग खत्म सा करने की साजिश पार्टी के ही नेताओं और पदाधिकारियों ने साल भर पहले से रच ली थी। विंध्य से लेकर भोपाल, लखनऊ और दिल्ली तक ऐसा जाल फैलाया कि पूरी पार्टी का संचालन इन्हीं नेताओं के इशारे पर होने लगा। लेकिन जब परिणामों की स्थिति देखी गई तो बसपा सुप्रीमो और संगठन के अत्यंत भरोसेमंद पदाधिकारी भी सन्न रह गये। लेकिन अब तो सब कुछ बसपा गंवा ही बैठी है, लिहाजा नये सिरे से रणनीति बनाने का दौर शुरू हो गया है। 
... तो बसपाईयों के करतूतों की खुल गई पोल, टिकट के खेल की कहानी सुन कर मायावती भी रह गईं सन्न

बहुजन समाज पार्टी के कुछ तथाकथित पदाधिकारियों ने ठीक एक साल पहले से इसका ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया था। सबसे पहले तो प्रदेश अध्यक्ष को बदलवाया और उसके बाद क्षेत्रीय जोन प्रभारियो की तैनाती करवाई। यहीं से शुरू हुआ एक बड़ा खेल। बसपा सुप्रीमो मायावती भी नहीं समझ पाई और उनके खास पदाधिकारी भी शांत रहे। खेल शुरू होने से लेकर अंतिम तक ऐसे कथित पदाधिकारियों की ही चलती रही जो पूरी तरह से पार्टी को बैठाने पर आमादा थे। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के परिणामों ने तो पार्टी सुप्रीमो मायावती को पूरी तरह से शून्य पर ला दिया। 
हुआ यह था कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने चुनाव पूर्व जो रणनीति बनाई थी उसके अनुसार कम से कम बीस से ऊपर सीटें बसपा को मिल सकती थी। यहीं से मैसेज हुआ था कि कांग्रेस और बसपा का गठबंधन होगा। लेकिन बाद में हुआ यह कि पूर्व पार्टी अध्यक्ष को पद से ही हटवा दिया गया। इसके पीछे का खेल यह था कि जो नई टीम बनी उसने पूरे प्रदेश में एक बड़ा खेल टिकट वितरण का किया था। पहले तो टिकट लेने के इच्छुक लोगों से पार्टी का चुनावी फार्म 10-10 हजार में बेचा। इसके बाद पार्टी फंडिंग की बात कही गई। इसके बाद व्यक्तिगत तौर पर मायावती के फंड के लिये अतिरिक्त राशि की मांग की गई थी। पार्टी के नये बने इन पदाधिकारियों ने चुनाव लडऩे के नये-निबाढ़े खिलाडिय़ों से अच्छी खासी रकम बटोर ली थी। लेकिन जब विधानसभा चुनावों के सिंबल बटने का नम्बर आया तो उसमें भी नये तरीके से मैनेज किया गया। जिसकी कल्पना भी पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को नहीं थी। साथ ही उन पुराने नेताओं को जो जनप्रतिनिधि रह चुके थे उन्हें अपमानित भी किया गया। लिहाजा एक-एक करके इन नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। विधानसभा चुनावों के जब परिणाम आये तो उसके बाद दिल्ली में हुई समीक्षा बैठक में इन्हीं शातिर नेताओं ने अपनी टीम के सदस्यों के साथ एक स्वर में कुछ नेताओं पर ठीकरा फोड़ दिया। लिहाजा कई नेता पार्टी से निष्कासित हो गये। इसके बाद लोकसभा चुनाव जब आया इन्हीं नेताओं ने एक बार फिर पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं को अपने जाल में ऐसा फांसा कि पार्टी ने उन्हें के इशारे पर सारे निर्णय किये। इसका परिणाम ऐसा निकला कि बसपा के नेता अब मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहे। 

बसपा की चौकड़ी पर जल्द गिरेगी गाज

बहुजन समाज पार्टी की विंध्य से लेकर भोपाल तक एक चौकड़ी ऐसी बनी जिसने साल भर पूरा खेल खेला। इसमें पार्टी अध्यक्ष अहिरवार से लेकर प्रदेश प्रभारी राजभर, क्षेत्रीय प्रभारी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामजी गौतम तथा जोन प्रभारी रामसखा वर्मा की चौकड़ी ने  पार्टी के नेताओं के बीच ऐसा मायाजाल फैलाया और उन्हें अपने ग्रिप में लेते हुये अपनी मनमाफिक कार्रवाई करा ली। रिपोर्ट ऐसी दी गई थी कि मप्र में विधानसभा में कम से कम 25 और लोकसभा में 5 सीटें बसपा की झोली में आयेगी। लेकिन परिणाम पूरी तरह से फ्लाप रहा। इसमें विंध्य की दो सीटें रीवा और सतना तथा चंबल व मालवा से तीन सीटे जीतने का दावा किया गया था। 

विस चुनाव में रीवा से लिया गया था तीन लोगों से पैसा

विधानसभा चुनावों के दौरान रीवा विधानसभा सीट से तीन लोगों से अच्छी खासी रकम उगाही गई। पहले निशाने पर दो नेता फंसे। लेकिन ऐन वक्त पर एक तीसरा नेता आ गया जिसने इस चौकड़ी के सामने लंबी रकम फेंकने की बात कही, बाद में दिया और पर्चा भरने के दिन सिंबल लेकर पहुंचा। सूत्र बताते हैं कि पार्टी ने पहले एक मुस्लिम नेता से डील की थी। जिससे 35 लाख की बात की गई थी। एडवांस के तौर पर पांच लाख ले लिये गये थे। लेकिन ठीक तीन दिन के भीतर ही एक व्यापारी नेता ने इस डील को बढ़ा कर 70 लाख में सेट किया और उससे 25 लाख रुपये ले लिये गये। उनका सिंबल भी रीवा आ गया था। पर्चा भरने के पहले 45 लाख रुपये देने थे। लेकिन इसी बीच में तीसरा सौदा दो करोड़ में हुआ। इसका आधा पैसा लखनऊ पहुंचा शेष स्थानीय स्तर पर ही बंट गया। इसमें भी खास बात यह थी कि उस समय की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता से इस बात को लेकर डील हुई थी कि यदि आपने ऐसा करा दिया तो 25 लाख ईनाम मिलेगा। वह ईनाम तो केवल एक ही नेता के हवाले रहा। अलबत्ता दो नेता खिसियानी बिल्ली की तरह शिकायत करते रहे अन्त में पार्टी छोड़ कर बसपा को हराने में जुट गये। 

देवराज ने क्यों छोड़ी थी पार्टी

पूर्व सांसद देवराज पटेल पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। विधानसभा चुनावों के दौरान लगभग दो महीने पहले से इनकी पूछ-परख शून्य कर दी गई थी। हालांकि बैठकों में ये शामिल होते रहे लेकिन कई बार इन्हेंं बैठकों के दौरान भाषणों में कुछ लोगों ने मानसिक रूप से आहत कर दिया था। किसी प्रकार विधानसभा चुनावों तक तो देवराज पटेल सहते-बहते रहे। विधानसभा परिणाम आने के बाद देवराज के सिर ही कई जगह हार का ठीकरा फोड़ा गया। कुछ लोग निष्कासित हो चुके थे और कुछ का नम्बर लगने वाला था। उसमें देवराज पटेल का भी नाम था। लिहाजा देवराज पटेल ने पहले ही कमलनाथ से सम्पर्क साध कर कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी। 

कई नेता परेशान थे चंदाखोरी से

जिन नेताओं ने पिछले विधानसभा चुनावों में उक्त चौकड़ी से सम्पर्क साध कर टिकट हासिल कर लिया था और अंत में उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। ऐेसे तीन नेताओं को लोकसभा चुनाव के पहले खासा परेशान किया गया। कुछ कारणों से ये नेता उन दिनों पोल नहीं खोल रहे थे लेकिन अब बता रहे हैं कि लोकसभा चुनाव की शुरूआती दौर से ही उनसे पार्टी चंदा के लिये फिर दबाव डाला जा रहा था। एक-दो बार सहयोग किया भी, लेकिन दूसरी ओर जब उन्होंने देखा कि प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बन गई है तो अच्छा यह होगा कि अब बसपा से ही कन्नी काट लो। लिहाजा दो नेताओं ने मुख्यमंत्री कमलनाथ से सदस्यता ली तो तीसरे करोड़पति हारे बिधानसभा बसपा प्रत्याशी ने राहुल गांधी के हाथों सदस्यता ले ली। 

अब माथा पीट रही मायावती

इन सारे घटनाक्रमों की जानकारी दो नेताओं ने पिछले दिनों लखनऊ में बसपा के एक शीर्षस्थ नेता को दी। जिसने बाद में इन दोनों नेताओं की मुलाकात पार्टी सुप्रीमो मायावती से कराई। इन दोनों नेताओं ने लगभग बीस मिनट में पूरी गाथा सुनाई। वे चुप-चाप सुनती रहीं। इस दौरान पार्टी छोड़ चुके एक बड़े नेता से मोबाइल पर बात भी करवाई गई, जिन्होने पूरे घटनाक्रमों की पुष्टि की। जिन्हें 20 जून को लखनऊ बुलाया गया है। उक्त नेता ने पहले तो जाने से मना किया लेकिन मायावती ने जब यह कहा कि पार्टी को खड़ा करने में आप लोगों की ही भूमिका थी, आप भले पार्टी में न आइये लेकिन एक बार मिलिये जरूर, लिहाजा उक्त नेता ने उनकी बात न टालते हुये शनिवार को लखनऊ जाने का फैसला भी ले लिया है। इन घटनाक्रमों के बाद से यह माना जा रहा है कि बसपा में अब सब कुछ नया होगा, नई रणनीति बनेगी, पुरानी चौकड़ी का अस्तित्व भी उन्हीं की भाषा के अनुरूप कहीं कचरे में न तब्दील हो जाये।

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