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कुछ नेताओं की चॉदी, शेष हाथ मलते नजर आ रहे कांग्रेसी नेता

 रीवा। नेताओं  के व्यवसाय का भी एक टाइम पीरियड होता है। जब वे खासे व्यस्त रहते हैं और उसी दौरान उन्हें कमाई भी होती है। चुनाव का सीजन तो समाप्त हो चुका है, अब आया है तबादले का सीजन। डेढ़ दशक बाद भाजपा के नेता इस मामले से जहां अपने आप को किनारे सा किए हुए हैं वहीं दूसरी ओर पहली बार कांग्रेस के नेता तेजी से सक्रिय है। लेकिन केवल 10 फीसदी नेताओं की ही पूछ-परख हो रही है। शेष की हालत यह है कि वे रेवांचल से जाते हैं और  तीन दिन भोपाल का चक्कर मारकर वापस लौट आते हैं। कमलनाथ सरकार में भोपाल से केवल अधिकारियों के तबादले हो रहे हैं। 

जबकि निचले स्तर के तबादले स्थानीय स्तर से ही होने हैं या फिर संभाग बदली का काम प्रभारी मंत्री के हवाले है। कुल मिलाकर कुछ नेताओं की चॉदी चल रही है। शेष कांग्रेसी होने के बावजूद हाथ मलते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की सरकार बनने पर रीवा के कांग्रेसियों में खासी खुशी जाहिर की थी। इसके पीछे का कारण सिर्फ इतना ही था कि इस साल चुनाव के बाद उनके दिन फिर जाएंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। नेताओं ने अपने-अपने इलाकों की अलग-अलग सूचियां बनाई और उन्हें अपने हिसाब से संबंधित विभागों को देना चाह रहे हैं, लेकिन अधिकांश जगह उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। भोपाल में बैठे मंत्री और उनके सलाहकार सीधे तौर पर यह कह रहे हैं कि विकासखण्ड प्रमुख और  जिला प्रमुख की अनुशंसा लेकर आईये तो तबादला हो पाएंगे। अब दूसरी ओर परेशानी यह है कि स्थानीय संगठन प्रमुख इन नेताओं को देखना तक नहीं चाहते। लिहाजा ऐसे कांग्रेसियों की हालत एक बार फिर दयनीय नजर आने लगी है। कल तक जो कांग्रेसी अपने-अपने इलाकों में विभिन्न विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों को घुड़किया दे रहे थे वे भी फिलहाल चुप होते नजर आ रहे हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि कांग्रेसियों में ही एक बार फिर  तबादला मुद्दे को लेकर आपस में ही विवादास्पद स्थितियां बनती जा रही हैं। 

रीवा में राज चलाना चाहते हैं अपना राज

बीते लोकसभा चुनावों में लम्बी हार झेल चुके सिद्धार्थ तिवारी राज एक बार फिर सरकार में अपनी चलाने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं। लगातार स्थानीय नेताओं की शिकायतें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों दिग्विजय सिंह और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी समझाइश दी है कि राजनीति में थोड़ा सा ऊंचा-नीचा  देखना पड़ता है। लेकिन राज तिवारी रीवा जिले में अपने उन पुराने लोगों को एक बार फिर दफ्तरों में देखना चाहते हैं जो उनके बाबा और पिता के करीबी हुआ करते थे। सत्यता तो यह है कि वर्तमान में पुराना गुट शून्य की स्थिति में जा पहुंचा है और  दूसरे नए गुट जो मंत्रिमण्डल स्तर में अपनी पैठ बनाए हुए हैं इन दोनों के बीच कशम-कश की स्थिति बनती जा रही है। एक नेता किसी अधिकारी को लाना चाह रहा है तो दूसरा उसका खुलकर विरोध कर रहा है। लिहाजा जिले के विभिन्न विभागों में किसे नए सिरे से प्रभार दिया जाना है यह ही तय नहीं हो पा रहा है। 

चार विभागों में कोई नहीं डाल सकता हाथ

रीवा जिले के चार विभागों के जिला अधिकारियों पर कोई हाथ नहीं डाल सकता। क्योंकि ये अधिकारी फिलहाल रीवा के नेताओं से भी ज्यादा पॉवर रखते हैं। जिला शिक्षा अधिकारी आरएन पटेल के सगे रिश्तेदार मुख्यमंत्री के निजी कार्यालय में तैनात राजेश पटेल के सगे रिश्तेदार हैं। वहीं पीडब्लूडी में अधीक्षण यंत्री की पैठ सीधे मुख्यमंत्री से है। स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक की छिंदवाड़ा में व्यक्तिगत पैठ है और मुख्यमंत्री का खुद को करीबी बताने से वे नहीं हिचकते। आरटीओ मनीष त्रिपाठी की पैठ सीधे मुख्य सचिव से होने के कारण उन पर भी आंच नहीं आने वाली। सूत्रों ने बताया कि इन चारों के खिलाफ जब शिकायतें हुई तो शिकायतकर्ता नेताजी को कान पर बता दिया गया है कि इन चार मामलों में कोई हाथ नहीं डालेगा। अगर आपको कोई बात करनी है तो सीधे मुख्यमंत्री जी से करिए। 

नेताओं के निशाने पर आए मंगू और भगत

इन दिनों कांग्रेसियों के निशाने पर पार्टी के  दोनों अध्यक्ष निशाने पर आ गए हैं। प्रभारी मंत्री का सीधा कहना है कि स्थानीय स्तर पर मनचाही पोस्टिंग के लिए जब तक जिला कमेटी के प्रभारी की अनुशंसा नहीं होगी तब तक कुछ नहीं होगा। लिहाजा सामान्य तौर पर ही दोनों नेताओं के भाव बढऩा स्वाभाविक है। अब दोनों नेता या तो ढूढ़े नहीं मिलते या फिर यह कह देते हैं कि अर्जी दिलवा दीजिए, देखते हैं। लिहाजा नाराज कांंग्रेसियों का गुट क्रमश: एक होता जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि भोपाल स्तर पर भी यही मचा हुआ है। संभाग लेविल में इधर से उधर मनचाही इच्छा रखने वाले कर्मचारी नेताओं के तो चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनका निशाना फिट नहीं हो पा रहा है। उधर कुछ नेताओं ने तबादलों का ठेंका तो ले लिया है लेकिन वे खुद भी हैरान है कि 10 जुलाई के बाद वे अपने लोगों को क्या जवाब देंगे। 

पंचायत विभाग में चल रही देवराज और पिंटू की 

रीवा जिले के पंचायत विभाग में इन दिनों दो नेता अपना प्रभुत्व होना बता रहे हैं। इसमें पूर्व बसपा सांसद देवराज सिंह पटेल और अनिल सिंह पिंटू का विशेष नाम लिया जा रहा है। क्योंकि पंचायत मंत्री कमलेश्वर पटेल जब भी रीवा में रहते हैं और लोग उनसे बात करना चाहते हैं या आवेदन देते हैं। तो वे सीधे कह देते हैं कि देवराज भाई या पिंटू से मिल लीजिए। लिहाजा नेता कई बार इस बात को लेकर व्यथित हो रहा है कि जो हमसे जूनियर है अब अपने काम के लिए इनके पीछे घूमना पड़ेगा। वहीं यह सब गतिविधियां देखकर कर्मचारी अपनी सेटिंग सीधे बनाने में भलाई समझ रहे हैं। उधर पंचायत मंत्री से किसी काम के लिए यदि लोग गुरमीत सिंह मंगू या भगत शुक्ल के पास कोई नेता कुछ कह रहा है तो इनके द्वारा यह कह दिया जाता है कि सीधे संपर्क करो भाई हम लोगों की नहीं चल पा रही है। 

रेवांचल रहती है नेताओं से फुल

इन दिनों रीवा से भोपाल जाने वाली रेवांचल एक्सप्रेस की पांचों एसी बोगिया नेताओं से भरी रहती है। अधिकांश नेता केवल सीजन का फायदा लेने रीवा से भोपाल तक की दौड़ लगा रहे हैं। हमारे सूत्र बताते हैं कि जिन नेताओं को स्थानीय संगठन का सहयोग नहीं मिल रहा है वे सीधे पहले दिग्विजय सिंह के बंगले पहुंचकर अपनी सिफारिशों में उनकी टीप लगवाना बेहतर समझते हैं। मझोले कद के नेता अजय सिंह राहुल भैय्या के यहां लेट-लपेट में चि_ी लिखवाने की होड़ लगाए हुए हैं। इसी प्रकार बचे-खुचे नेता कांतिलाल भूरिया, अरूण यादव और सुरेश पचौरी के यहां आरजू-मिन्नत करने पहुंच रहे हैं। नेताओं का जब सबकुछ हो जाता है तो ले-देकर मामला संगठन की अनुशंसा पर पहुंच जाता है। लिहाजा निराश होकर नेतागण फिर  वहीं पहुंच जाते हैं जहां से उन्होंने सफर शुरू किया था। 

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