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रीवा की राजनीति में न ही कोई दोबारा महापौर बना न ही मिला कोई बड़ा पद

 रीवा। विंध्य प्रदेश की राजधानी रहा रीवा कभी मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद से सुशोभित होता रहा वहीं अब रीवा में महज नगर निगम का महापौर ही एक बड़े पद के रूप में शुमार हो रहा है। इसे राजनैतिक अभिशाप माना जाये या फिर राजनीति की चाल, कि यहां पर न तो कोई दोबारा महापौर बना। साथ ही जो एक बार महापौर बना उसे दोबारा राजनीति में कोई बड़ी जगह नहीं मिली। मप्र के अन्य इलाकों में बनने वाले महापौर या तो विधानसभा पहुंचे या फिर उन्हें लोकसभा तक पार्टियों ने पहुंचाया। वहीं रीवा के महापौर बनने वाले नेताओं को इस मामले में बिल्कुल ही निचले स्तर पर रखा गया। 
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नगरीय निकाय रीवा में वर्ष 1994 में लंबे अर्से बाद चुनाव हुये थे और राजनैतिक गोटियों के सहारे शुरूआत के तीन साल तो किसी प्रकार कांग्रेस ने अपना कब्जा रखा लेकिन उसके बाद से लगातार 22 सालों से भारतीय जनता पार्टी का ही कब्जा बरकरार है। लेकिन इन 22 सालों के दौरान महापौर का कार्यकाल खत्म करने के बाद उन नेताओं की राजनीति ही लगभग समाप्त सी हो जाती है। इन नेताओं को छोटे-मोटे पद देकर राजनीति में जिंदा तो रखा जा रहा है लेकिन आगे बढऩे के मौकों से पूरी तरह किनारे कर दिया जाता है।  
अगर हम शुरूआत के तीन सालों यानि कि वर्ष 1994 से 97 तक की बात करें तो सबसे पहले महापौर के रूप में अमीरुल्ला खांन पदासीन हुये। उन दिनों रीवा की राजनीति में स्व. श्रीनिवास तिवारी का दबदवा हुआ करता था और श्री खान कांग्रेस की राजनीति में नागेन्द्र सिंह गुट के सदस्य हुआ करते थे। दो साल के भीतर ही सरकार ने अपने ही महापौर को पदच्युत करते हुये प्रभारी के रूप में पार्षद स्व. सावित्री पाण्डेय को महापौर बना दिया। नौ महीने में ही इनसे भी पद छीनते हुये श्री तिवारी ने उन दिनों के अपने खास कमलजीत सिंह डंग को सरकारी तौर पर मनोनीत करवा दिया। इन तीनों पूर्व महापौरों में से अमीरुल्ला खान और सावित्री पाण्डेय अब इस दुनिया में नहीं है, वहीं 85 दिन के लिये बने पूर्व महापौर कमलजीत सिंह डंग की राजनीति भी कहां है यह सबको विदित है। 
इसके बाद से लगातार भाजपा के महापौरों का कब्जा रहा है। लेकिन जब ये नेता महापौरी की कुर्सी से उतरे तो दोबारा उन्हें कुर्सी नसीब होती नहीं दिख रही है। खास बात यह थी कि इन नेताओं ने लगातार प्रयास भी किया लेकिन शायद अभिशाप ऐसा लगा कि दोबारा उन्हें पद ही नहीं मिल पा रहा है। गौरतलब है कि राजेन्द्र ताम्रकार चुनाव जीत कर दो साल तक 1 जनवरी 98 से 29 दिसम्बर 99 तक महापौर रहे। लेकिन इसके बाद से बीस साल बीत गये पार्टी ने उन्हें किसी बड़े पद से नहीं नवाजा। ले-दे कर बेचारे अब कालेज जनभागीदारी समिति का अध्यक्ष बन कर ही खुश हैं। इसी क्रम में श्रीमती आशा सिंह जनवरी 2005 तक लगातार पांच साल महापौर रहीं, उसके बाद वे भी अब केवल अपने घर तक ही सीमित हैं। पार्टी उन्हें अब किसी स्तर पर कोई बड़ा पद भी नहीं दे रही। इसके बाद महापौर बने युवा नेता वीरेन्द्र गुप्ता, वर्ष 2010 तक ये भी महापौर रहे। इन्होंने मध्यप्रदेश के बड़े नेताओं से बेहतर संबंध बनाते हुये राष्ट्रीय नेताओं तक से संबंध बनाये लेकिन इनके पीछे भी ऐसी चाल चली गई कि 2010 के बाद से इन्हें कोई बड़ा पद नहीं मिला। अपनी दम पर संगठन के पद भले पा गये हों लेकिन सरकारी पद के लिये तरस गये। विधानसभा स्तर की टिकट मिलना तो बहुत दूर की बात है। इनके पीछे समस्या यह थी कि ये रबर स्टाम्प नहीं बन पाये लिहाजा राजनैतिक दृष्टिकोण से इन्हें किनारे ही रखा गया और चुनावों में कथित तौर पर सहयोग के लिये पद दिये गये ताकि सक्रियता बनाये रहें। उधर वर्ष 2010 से जनवरी 2015 तक महापौर रहे शिवेन्द्र सिंह की राजनैतिक सक्रियता भी अब न के बराबर ही दिखाई दे रही है। इन पर मुख्य आरोप रहा कि वे महापौर रहते हुये भी महापौर न के बराबर थे। क्योंकि वे उतना ही काम कर पाते थे जितना उनके बास का आदेश होता था। यह बात सही है कि उनके कार्यकाल में शहर में बजट अच्छा खासा आया था, 60 फीसदी का सदुपयोग हुआ तो 40 फीसदी का दुरुपयोग भी। जिसे महालेखाकार समिति ने भी जांच में पाया है। साथ ही जांच भी चल रही है। उधर पिछले साढ़े चार सालों से महापौर के रूप में ममता गुप्ता शहर के विकास के लिये प्रयासरत हैं। इनका कार्यकाल जनवरी 20 में समाप्त होना है। लेकिन ये लगातार विपक्षियों के निशाने पर रहीं। साथ ही आरोप यह भी रहा कि श्रीमती गुप्ता ने उन्हीं मामलों को गंभीरता से लिया जिन्हें माननीय ने निर्देशित किया। शेष से ज्यादा मतलब रखा नहीं। कांग्रेसी इन्हें भी रबर स्टाम्प का दर्जा देते हैं। अलबत्ता जो हो सका, विकास में इन्होंने योगदान दिया। लेकिन श्रीमती गुप्ता के राजनीति के अगले कदम कहां जायेंगे यह कह पाना मुश्किल है क्योंकि अभी तक के महापौरों की स्थिति राजनीति के मामले में बड़ी ही डांवाडोल सी रही है। पद से उतरने के बाद इनकी राजनीति का क्या होगा, वक्त ही बतायेगा? 
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अपने जमाने में बड़े चर्चित रहे महापौर अमीरुल्ला

दो साल महापौर रहने वाले अमीरुल्ला खान अपने कार्यकाल में खासे चर्चित रहे। नागेन्द्र सिंह की आकृति टाकीज में कार्य करने वाले अमीरुल्ला खान उन्हीं की कृपा से महापौर बन गये थे। नागेन्द्र सिंह उन दिनों कांग्रेस में थे। लेकिन स्व. श्री तिवारी के आगे चल नहीं पा रही थी। वहीं कार्यकाल के अंतिम दिनों में अमीरुल्ला खान तिवारी खेमे में चले गये थे। इनके कार्यकाल के दौरान पार्षदों की बैठक में कांग्रेसी पार्षद ही आपस में खूब वाक्य युद्ध करते थे। नागेन्द्र सिंह का साथ छोडऩे के कारण भी अमीरुल्ला चर्चाओं में रहे। वहीं महापौर रहने के दौरान कब्बाली गायकी भी चर्चा में रही। तीन साल पहले अमीरुल्ला खान का भी निधन हो गया। 

अगली टिकट उसी को, जिसे वे चाहेंगे?

छ: महीने बाद होने वाले महापौर चुनाव के लिये एक बार फिर खुसुर-फुसुर शुरू हो चुकी है। अभी आरक्षण लाटरी भी निकलना बाकी है। यदि महापौर का पद सामान्य अनारक्षित हो गया तो लडऩे वालों की एक लंबी लिस्ट बन जायेगी। अगर अन्य पिछड़ा वर्ग या फिर अजा-अजजा के अलावा किसी महिला कोटे में गई तो लड़ाकों की भीड़ थोड़ा छंट जायेगी। अलबत्ता भाजपाई कहते हंै कि भाजपा में अब बहुत भीड़ हो गई है। संगठन और अन्य दमदार नेता बेअसर हैं। टिकट तो उसे ही मिलेगी जिसे 'वेÓ चाहेंगे। क्योंकि पिछले इतिहास  के अनुसार भाजपा का रीवा शहरी इलाके में हमेशा दबदवा रहा है। इस मामले में दूसरा तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि यदि परिसीमन हुआ तो शहर के अगल-बगल के लगभग 13 गांव भी नगर निगम सीमा में शामिल होंगे। लिहाजा एक बार फिर भाजपा को उन हिस्सों में घुसना पड़ेगा जहां अभी उनकी पकड़ नहीं है। 

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