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लोकसभा सीट रीवा: ये हैं वर्ष 1951 से 2014 तक सांसद

रीवा। विंध्य प्रदेश की रीवा लोकसभा सीट हमेशा भौगोलिक स्थिति के समान उतार-चढ़ाव वाली परिणाम देती रही है। बात करते हैं यहां हुए सबसे पहले लोकसभा चुनाव की। वर्ष 1951 में लोकसभा सीट का पहला चुनाव कराया। जहां वर्ष 1951 से 1967 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रत्याशियों का ही यहां दबदबा रहा है। वर्ष 1951 में लोकसभा सीट से पहले सांसद के रूप में राजभान सिंह तिवारी चुने गए थे। इसके बाद वर्ष 1957 इंडियन नेशनल कांग्रेस से ही शिवदत्त तिवारी दूसरे सांसद के रूप में चुने गए। वर्ष 1962 में एक बार फिर वह तीसरे सांसद के रूप में चुने गए। वर्ष 1967 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के चैथे सांसद के रूप में शम्भूनाथ शुक्ल बने।
वर्ष 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस का जादू नहीं चल पाया और इस चुनाव में रीवा महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की और वह पांचवें सांसद के रूप में चुने गए। इसके बाद वर्ष 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय लोक दल से यमुना प्रसाद शास्त्री ने जीत हासिल की। वर्ष 1980 में एक बार फिर महाराज मार्तण्ड सिंह जू देव ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1984 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की सीट पर एक बार फिर जीत दर्ज की। वर्ष 1989 में यमुना प्रसाद शास्त्री ने जनता पार्टी से सांसद चुने गए। वर्ष 1991 में भीम सिंह पटेल बहुजन समाज पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1996 में एक बार फिर जीत दर्ज करते हुए सांसद चुने गए। वर्ष 1998 में चन्द्रमणि त्रिपाठी भारतीय जनता पार्टी से सांसद चुने गए तो वहीं वर्ष 1999 में इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी से सुन्दरलाल तिवारी सांसद बने। वर्ष 2004 में एक बार फिर चन्द्रमणि त्रिपाठी भारतीय जनता पार्टी की सीट से जीत दर्ज करते हुए सांसद बने। वर्ष 2009 में बहुजन समाज पार्टी से देवराज पटेल सांसद बने। जबकि 2014 में लोकसभा चुनाव से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी जनार्दन मिश्रा रीवा सांसद चुने गए।
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लोकसभा सीट रीवा
रीवा लोकसभा सीट अंतर्गत 8 विधानसभा आती है जिसमें त्योंथर सिरमौर सेमरिया देवतालाब मऊगंज मनगवां गुढ व रीवा शामिल है सभी सीट पर भाजपा के विधायक हैं वर्तमान परिस्थिति में सांसद एवं भाजपा नेता  जनार्दन मिश्रा की स्थिति मजबूत नहीं बताई जा रही है हालांकि विंध्य में बुरी तरह पराजित होने के बाद कांग्रेस की दावेदारी भी बेहद कमजोर नजर आ रही है
राजनैतिक घटना
रीवा लोकसभा सीट में सदैव ही कांग्रेश गुटबाजी का शिकार रही है यही कारण है कि विंध्य में चलने वाले श्रीनिवास तिवारी गुट एवं अर्जुन सिंह गुट की चर्चा राजनीति में होती है हालांकि दोनों नेता ही दिवंगत हो चुके हैं लिहाजा एक समय लगा गुट बाजी की राजनीति बंद होगी लेकिन अभी भी गुट की राजनीति को लेकर कांग्रेसी कई खेमे में बटी हुई है
रोजगार का मुद्दा
कहने को तो रीवा लोकसभा क्षेत्र माइनिंग एवं सीमेंट कंपनियों के लिए बेहतर माना जाता रहा है लेकिन स्थानीय स्तर पर बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने की मुहिम ना के बराबर रही है युग के प्रमुख मुद्दों में शुमार है साथ ही बिंद के पिछड़ेपन का भी मुद्दा प्रमुख रहा है

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